ध्वज, शस्त्र, शास्त्र, शक्ति, शिव और शमी पूजन के साथ सम्पन्न हुआ वार्षिक महाप्रसाद का वितरण 

गाजीपुर। विजयादशमी के पावन अवसर पर सिद्धपीठ हथियाराम मठ में ध्वज, शस्त्र, शास्त्र, शक्ति, शिव और शमी पूजन के साथ वार्षिक महाप्रसाद का वितरण देर रात सम्पन्न हुआ।

           पीठाधिपति महामंडलेश्वर स्वामी श्री भवानी नन्दन यति जी महाराज ने यजमान व विशिष्ठजनों संग सिद्धेश्वर महादेव मंदिर में रुद्राभिषेक और शमी वृक्ष का पूजन अर्चन किया। 

       उल्लेखनीय है कि लगभग 750 वर्ष प्राचीन सिद्धपीठ की आराध्य भगवती बुढ़िया माई (वृद्धाम्बिका देवी) के दरबार में नवरात्र पर्यन्त चले यज्ञ-जप व धार्मिक अनुष्ठान पूर्णाहुति के साथ ही दशहरा के दिन सदियों से चली आ रही परम्परानुसार सिद्धपीठ के 26वें पीठाधिपति महामण्डलेश्वर भवानीनंदन यति ने वैदिक ब्राह्मणों के साथ प्रातः काल से ही हरिहरात्मक पूजन, शस्त्र पूजन, शात्र पूजन व ध्वजा पूजन सम्पादित किया।

         पूजन अर्चन के उपरांत सत्संग सभा को सम्बोधित करते हुए रांची विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर तपन कुमार शांडिल्य ने कहा कि शिक्षा को सदाचार युक्त बनाना चाहिए, ताकि बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ ही अपनी सभ्यता व संस्कृति की भी जानकारी मिले। उन्होंने कहा कि हम सदियों से शिक्षा देने का कार्य किए हैं, जो गुरुकुल में दी जाती है। प्राचीन काल में विदेशों से आकर लोग यहां शिक्षा ग्रहण करते थे, लेकिन आज भारत में पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति को बढ़ावा दिया जाना चिंता का विषय है। भारत को फिर से विश्वगुरु बनाना होगा। इसके लिए ज्ञान के साथ मानवीय मूल्यों और कौशल का होना जरूरी है। 

         काशी विद्यापीठ वाराणसी के कुलपति प्रोफेसर आनंद कुमार त्यागी ने कहा कि ज्ञान तो दिया गया किन्तु कौशल और मानवीय गुण पर ध्यान नहीं दिया गया। इन दो चीजों पर ध्यान देना जरूरी है। समाज जनित एक नई बुराई पनप रही है कि आत्महत्याएं हो रही हैं, जिसे रोकने के लिए मानवीय मूल्यों का होना जरूरी है। शिक्षा में नवाचार, शिक्षा का संचयन और शिक्षा का प्रसार, तीनो को एक साथ चलना चाहिए। प्राचीन काल में तीनों चीजें एक ही जगह होती थीं, जबकि आज तीनों अलग अलग संस्थाओं में चलने लगे। उन्होंने कहा कि सिर्फ ज्ञान ही ज्ञान होगा तो हैवान पैदा होंगे। शिक्षा वह है जो प्रकृति के साथ जोड़ती है। वाराणसी के संस्कृत महाविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर डा. अमिता दूबे ने कहा कि भारत को सामाजिक प्रगति तभी मिलेगी, जब समवेत रूप से कोई कार्य होगा। उन्होंने श्रीराम का उदाहरण देते हुए कहा कि राम ने रावण पर विजय के लिए केवट, निषाद, गिद्ध, बानर सबको साथ लेकर चलने का काम किया था। कहा कि हमें बदलते मूल्यों के साथ सनातन क्या है, इसे पहचानने की भी आवश्यकता है। 

      अन्य प्रबुद्धजनों ने अपने ओजपूर्ण विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अनुशासन के साथ साथ जीवन में शिक्षा तथा संस्कार का होना आवश्यक है। इस कार्य के लिए ऐसे मठ मंदिरों और संतों के सानिध्य रखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यहां धर्म और संस्कार के साथ ही मानवीय मूल्यों की सीख देते हुए समाज को एकता के सूत्र में पिरोने का काम किया जाता है।

          सिद्धेश्वर महादेव प्रांगण में आयोजित सभा में स्वामी भवानीनन्दन यति ने आशीर्वचन देते हुए कहा कि अति प्राचीन सिद्ध संतों की तपस्थली सिद्धपीठ अध्यात्म जगत में तपोभूमि के रूप में विख्यात है। अमृतमयी बुढ़िया माई की कृपा व सिद्धपीठ के पूर्व के 25 सिद्ध संतों के कठोर तप से आज यहां की माटी भी अमृत के समान हो गयी है। यहां के सिद्ध संतों के ज्ञानरूपी प्रकाश से समूचा अध्यात्म जगत आलोकित है। मैं स्वयं इस पीठ के माटी की सेवा का अवसर प्राप्त कर अपने को सौभाग्यशाली समझता हूं। उन्होंने विजया दशमी के अवसर पर लोगों से अपने अंदर छिपी बुराइयों का परित्याग कर सत्य आचरण करने की अपील की। कहा कि हमारे लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से बड़ा कोई आदर्श नहीं हो सकता, उनके आदर्शों से प्रेरणा लें। उन्होंने कहा कि सिद्धपीठ के गुरुजनों ने भाषण ही नहीं की बल्कि राशन की भी व्यवस्था की, जो राष्ट्र भारत को जोड़ने का काम किए। कहा माला जपने से भजन नहीं होता। गौ सेवा, साफ सफाई, मंदिर बनवाना भी भजन के समान है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा कर्म करते रहो, अगरबत्ती धूप माला राम राम कहने से भजन नहीं है। विचार को अच्छा रखना ही भजन कहलाता है। कार्यक्रम में बिरनो के संत देवरहा बाबा, जंगीपुर विधायक डा. वीरेंद्र यादव, डा. रत्नाकर त्रिपाठी, डा. मंगला प्रसाद, आचार्य सुरेश, पंडित विनोद पांडेय, संजय पांडेय, पूर्व राज्यमंत्री डा. रमाशंकर राजभर, भोपाल विश्वविद्यालय के डॉ. आनंद सिंह, डा. सानंद सिंह, अरविंद सिंह, भानू प्रताप सिंह, डा. नागेंद्र सिंह, सादात के ब्लाक प्रमुख प्रतिनिधि संतोष यादव, प्रवक्ता डा. संतोष मिश्रा सहित हजारों की संख्या में शिष्य श्रद्धालु मौजूद रहे। वहीं परम्परानुसार महाराज श्री ने बुढ़िया मां का भोग लगाया हलवा पूड़ी का प्रसाद पाने के लिए हजारों श्रद्धालुओं ने कतारबद्ध होकर महामंडलेश्वर के हाथों प्रसाद प्राप्त किया। इसे पाने के लिए क्षेत्र के ही नहीं अन्य प्रांतों के लोग भी सिद्धपीठ पर पहुंचे थे।

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