बाढ़ हर साल उजाड़ देती है बसुका के किसानों की उम्मीदें

सैकड़ों एकड़ धान की फसल होती है बर्बाद, पर नहीं मिलता मुआवजा 


✍️हिमांशु राय 

गाजीपुर। गंगा की बाढ़ जब अपना रौद्र रूप दिखाती है तो उसका सबसे बड़ा खामियाजा खेतों में पसीना बहाने वाले किसानों को भुगतना पड़ता है। लेकिन गाजीपुर जिले के बसुका गांव के किसानों की पीड़ा सिर्फ बाढ़ तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि हर वर्ष बाढ़ उनकी सैकड़ों एकड़ धान की फसल को बर्बाद कर देती है, लेकिन उनकी क्षति का सर्वे कभी नहीं हुआ। ग्रामीणों के मुताबिक, कई दशकों से बरसात और गंगा के बढ़ते जलस्तर का पानी खेतों में पहुंचता है और देखते ही देखते किसानों की महीनों की मेहनत पानी में डूब जाती है। धान की तैयार होती फसल बर्बाद होती है, लागत डूब जाती है और किसान कर्ज तथा आर्थिक संकट से जूझता रह जाता है।विडंबना यह है कि फसल बर्बाद होने के बाद भी पीड़ित किसानों को न तो अपेक्षित मुआवजा मिल पाता है और न ही ऐसी कोई ठोस सरकारी मदद दिखाई देती है, जिससे उनकी आर्थिक क्षति की भरपाई हो सके। कई ग्रामीण अब इसे अपनी नियति मान चुके हैं। उनका कहना है कि बाढ़ आएगी, फसल बर्बाद होगी और उन्हें अपने नुकसान के साथ ही जीना पड़ेगा। किसानों की क्षति का आकलन करना प्रशासन की जिम्मेदारी होती है और जब फसलें वास्तव में बाढ़ से नष्ट हो रही हैं तो प्रभावित किसानों को मुआवजा भी मिलना चाहिए। पीड़ित किसानों का कहना है कि यदि सर्वे होगा, नुकसान का आंकलन होगा और पात्रता के अनुसार सरकारी नियमों के तहत कार्रवाई होगी, तभी किसानों को यह भरोसा मिलेगा कि सरकार और प्रशासन उनकी परेशानी को गंभीरता से ले रहे हैं। उनका कहना है कि बाढ़ से निपटने के लिए हर वर्ष तैयारियां होती हैं। बाढ़ चौकियां बनाई जाती हैं, अधिकारियों को जिम्मेदारियां दी जाती हैं और प्रभावित क्षेत्रों पर नजर रखने के निर्देश जारी होते हैं। लेकिन बसुका के किसानों का दर्द एक अहम सवाल खड़ा करता है—क्या बाढ़ प्रबंधन केवल पानी की निगरानी तक सीमित है या खेतों में बर्बाद हो रही फसलों की भी निगरानी होगी?

     अब जरूरत इस बात की है कि जिला प्रशासन बसुका गांव को लेकर तत्काल स्थलीय जांच और फसल क्षति का सर्वे कराए। वास्तविक नुकसान सामने आए और यदि प्रभावित किसान सरकारी मानकों के अनुसार मुआवजे के पात्र हैं तो उन्हें नियमानुसार राहत उपलब्ध कराई जाए।

        बसुका के किसानों की आंखों में आज भी उम्मीद है कि शायद इस बार उनकी आवाज गाजीपुर प्रशासन तक पहुंचेगी और उन्हें उनका वाजिब हक मिल सकेगा या हर वर्ष की तरह इस बार भी किसानों की बर्बाद फसल के साथ उनकी उम्मीदें भी बाढ़ के पानी में बह जाएंगी।

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