देव प्रबोधिनी एकादशी का पौराणिक महत्व – डा.ए.के. राय
भारतीय सनातन परंपरा में कार्तिक मास का विशेष महत्व बताया गया है। पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार कार्तिक माह की विभिन्न निर्धारित तिथियों पर विशेष पर्व का आयोजन होता है यथा सुहागिन महिलाओं का करवाचौथ व्रत, धनवन्तरि पूजा, लक्ष्मी पूजा (धन तेरस), छोटी दिवाली, दिपावली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज, डाला छठ, अक्षय नवमी, देव प्रबोधिनी एकादशी व कार्तिक पूर्णिमा।
पद्मपुराण में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवप्रबोधिनी एकादशी कहा गया है। इसे देवउठनी और देवउठानी नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि जगत के पालनहार भगवान विष्णु अपने चार माह के शयन के बाद इसी दिन योगनिद्रा से निद्रामुक्त होते हैं। इसी दिन भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का देवी तुलसी के साथ विवाह हुआ था। इसलिए इस एकादशी को पूरे वर्ष के सभी 24 एकादशी में विशेष स्थान प्राप्त है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सृष्टि के पालक भगवान श्रीविष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन क्षीरसागर में योग निद्रा में प्रस्थान करते हैं और चार माहोपरांत कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन योग निद्रा से जागृत होते हैं। आज ही संत लोगों का चार माह से चलने वाला चातुर्मास्य व्रत के यम, नियम, संयम का समापन होता है और गृहस्थ जनों के समस्त मांगलिक शुभ कार्य और शुभ मुहूर्त आरंभ होते हैं। एकादशी के दिन श्रद्धालु जन व्रत, पूजा पाठ कर भगवान विष्णु को भोग लगाते हैं। वहीं महिलाएं गन्ने से मंडप तैयार कर शालिग्राम जी के साथ तुलसी जी का विवाह सम्पन्न कराती हैं। इसके लिए व्रती को प्रातः अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्नानादि कर भक्ति भाव से श्री विष्णु जी की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर विधि विधान और भक्ति भाव से पूजन अर्चन कर श्रीविष्णु सहस्त्र नाम,श्रीपुरुष सूक्त तथा श्रीविष्णु से सम्बंधित मंत्र “ऊँ श्रीविष्णवे नमः”का जाप करना चाहिये। इस दिन अन्नादि का त्याग कर सिर्फ फलाहार करना चाहिए।
इस वर्ष यह पर्व 01 नवंबर शनिवार को मनाया जायेगा।
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