राष्ट्र के प्रति समर्पित रहे सरदार वल्लभ भाई पटेल – डा. ए. के. राय 

जन्म दिन 31 अक्टूबर पर विशेष 


        देश को ब्रितानी हुकूमत से मुक्त करने में जिन महापुरुषों की भूमिका अग्रणी रही, उसमें सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम आज भी आदर के साथ लिया जाता है।                                  

        सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड में किसान झवेरभाई पटेल के चौथे पुत्र के रूप में हुआ था। उनकी माता का नाम लाडबा देवी था। झवेरभाई पटेल ने वर्ष 1857 में मंगल पाण्डेय के आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। गुजरात में अपनी शुरुआती शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने इंग्लैंड से कानून की शिक्षा ली और बैरिस्टर बन कर देश लौटने पर वे महात्मा गांधी के स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय हो गए। देश की एकता, अखंडता और राष्ट्रीयता को अपना लक्ष्य मानकर एक तरफ जहां उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तो वहीं उन्होंने किसान हितों की रक्षा के लिए किसानों का भी नेतृत्व भी किया। खेड़ा में किसानों के लिए टैक्स माफी की मांग करते हुए वर्ष 1918 में उन्होंने आन्दोलन को गति दी और नमक सत्याग्रह जैसे आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई और कई बार जेल यात्रा की। प्रमुख किसान आंदोलन के रूप में उन्होंने 1928 में सूरत के बारदोली सत्याग्रह का नेतृत्व किया। किसानों पर बढ़े टैक्स को लेकर सरदार पटेल ने बड़ा आंदोलन किया जिसमें महिलाओं ने बड़ी संख्या में भागीदारी की।

भारी विरोध प्रदर्शन के कारण अंग्रेजों को झुकना पड़ा और उन्होंने अपना आदेश वापस लिया। यह सरदार पटेल की बड़ी जीत थी। 23 मार्च 1931 को जब आजादी के दीवानों सरदार भगत सिंह, राजगुरु आदि को फांसी दे दी गयी तो देशवासियों में गांधी जी के प्रति असंतोष और आक्रोश फैल गया। गांधी जी क्रांतिकारियों की फांसी रोकने में पूरी तरह असफल रहे थे इससे देशवासियों में उनके प्रति आक्रोश फैलने लगा था। क्रांतिकारियों की मौत देशवासियों के दोनों पर एक करारी चोट थी और इसे पूरा देश बौखलाया हुआ था। इसके लिए लोग गांधी जी को दोषी मान रहे थे। गांधी जी देशवासियों की भावनाओं को अच्छी तरह से समझ भी रहे थे। यही कारण था कि फांसी की घटना के 6 दिन बाद ही कराची में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 46वें राष्ट्रीय अधिवेशन के नेतृत्व का साहस नहीं कर पाये। ऐसे में नेतृत्व की जिम्मेदारी सरदार पटेल को सौंप गई और उन्होंने कराची में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षता की। उनके नेतृत्व क्षमता से प्रभावित होकर उन्हें “सरदार” के  नाम से पुकारा जाने लगा। उन्होंने विदेशी वस्त्रों के वहिष्कार करने तथा स्वदेशी वस्त्रों को अपनाने जैसे आन्दोलन को धार दी और  विदेशी कपड़ों की होली जलाकर विरोध प्रदर्शन किया। सरदार पटेल ने 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने पूरे देश में  घूम कर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन को धार दी। उनकी सक्रियता को रोकने के लिए ब्रितानी सरकार ने उन्हें 1942 में गिरफ्तार कर अन्य कांग्रेसी नेताओं के साथ 1945 तक उन्हें अहमदनगर किले में कैद रखा।

        प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, अधिवक्ता और राजनेता के रुप में देश के लिए निस्वार्थ सेवा करने वाले कर्मठ कर्मयोगी के रूप में लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी रही। अंग्रेजी दासता से जूझ रहे देशवासियों को जागरूक करने हेतु सरदार वल्लभ भाई पटेल के कई नारे दिये। राष्ट्रीय एकता को मजबूती प्रदान करने एवं देशवासियों को एकजुट करने हेतु उनका श्रेष्ठ नारा “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” रहा। इसके अतिरिक्त उन्होंने खेड़ा सत्याग्रह 1918 के दौरान “कर मत दो” का नारा देकर देशवासियों से अंग्रेज़ों को टैक्स न देने हेतु प्रेरित किया था। 

         देश के प्रथम उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में उनके कार्य प्रेरणा स्रोत हैं। उनके विचार, दृढ़ निश्चय ने देश को एकीकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उनके विचार और संकल्प आज भी प्रासंगिक हैं। यह उनका दृढ़ संकल्प ही था कि स्वतंत्रता के बाद, उन्होंने भारत की 562 रियासतों को अधिग्रहित कर और एक सूत्र में पिरोकर स्वतंत्र भारत के एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारत को एक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। उनके अडिग संकल्प और दृढ़ निश्चय  के कारण ही उन्हें लोह पुरुष की संज्ञा दी गई थी। उन्होंने राष्ट्रीय एकता, अखंडता और आर्थिक विकास के लिए स्वदेशी उत्पादनों के प्रयोग पर जोर देते हुए आर्थिक समृद्धि की वकालत की थी। उनका निधन 15 दिसंबर 1950 को मुम्बई के बिड़ला हाउस में हृदयाघात से हुआ था। राष्ट्र के प्रति उनके त्याग और समर्पण को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया।                    उनकी राष्ट्र व्यापी प्रतिभा से पूरे विश्व को पहचान दिलाने हेतु, देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा, उनके जन्म दिवस के शुभ अवसर पर 31 अक्टूबर, 2018 को उनकी विशाल प्रतिमा का उद्घाटन किया गया। यह प्रतिमा गुजरात प्रान्त के केवड़िया में सतपुड़ा और विंध्याचल की  पहाड़ियों के मध्य नर्मदा जिले के नर्मदा नदी के तट पर स्थित है। यह प्रतिमा विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है जो 182 मीटर (597 फीट) ऊंची है। 

        उनकी राष्ट्र व्यापी प्रतिभा से पूरे विश्व को पहचान दिलाने हेतु, देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा, उनके जन्म दिवस के शुभ अवसर पर 31 अक्टूबर, 2018 को उनकी विशाल प्रतिमा का उद्घाटन किया गया। यह प्रतिमा गुजरात प्रान्त के केवड़िया में सतपुड़ा और विंध्याचल की  पहाड़ियों के मध्य नर्मदा जिले के नर्मदा नदी के तट पर स्थित है। यह प्रतिमा विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है जो 182 मीटर (597 फीट) ऊंची है। 

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