दिव्यांग सियाराम की मौत का मामला पहुँचा राष्ट्रपति भवन
गाज़ीपुर। नोनहरा थाना पर प्रदर्शनकारियों पर रात में हुए लाठी चार्ज में घायल रुकुन्दीपुर के विकलांग युवा सियाराम उपाध्याय की मौत का मामला अब राष्ट्रपति भवन तक पहुँच गया है।
सामाजिक कार्यकर्ता एवं समग्र विकास इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्रजभूषण दूबे ने महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को याचिका भेजकर न्यायिक जांच और पीड़ित परिवार को 50 लाख रुपए मुआवज़ा देने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि पूरे प्रकरण में पुलिस और भाजपा नेता मामले में लीपापोती कर रहे हैं।

श्रीदूबे ने राष्ट्रपति को प्रेषित याचिका (पंजीयन संख्या पीआरएसईसी/ ई/ 2025/ 0053184) में कहा है कि 9 सितंबर की रात थाना नोनहरा परिसर में पुलिस द्वारा किए गए बर्बर लाठीचार्ज में गंभीर रूप से घायल सियाराम उर्फ़ जोखू उपाध्याय की मौत हुई, जो पुलिस अभिरक्षा में असामान्य मृत्यु का स्पष्ट मामला है। कहा गया है कि जब शाम 6 बजे से धरना चल रहा था, तो आधी रात के बाद अचानक लाठीचार्ज किया गया। ऐसे में यह घटना सीधे तौर पर पुलिस अभिरक्षा में मौत की श्रेणी में आती है और दोषियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। ब्रजभूषण दूबे ने यह भी आरोप लगाया कि मृतक के पिता गिरिजाशंकर उपाध्याय द्वारा दी गई तीन पन्नों की तहरीर को पुलिस ने दबा दिया और दबाव बनाकर दूसरी तहरीर तैयार कराई। उन्होंने इसका प्रमाण स्वरूप फोटो भी राष्ट्रपति को भेजे गए याचिका में संलग्न किया है।
दूबे ने सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी बनाम स्टेट ऑफ यूपी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इतनी गंभीर घटना में पुलिस को तत्काल एफआईआर दर्ज करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके अलावा पुलिस ने गंभीर रूप से घायल सियाराम का इलाज तक नहीं कराया, जो मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है।
बताते चलें कि पुलिस लाठीचार्ज का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ । लाठीचार्ज में घायल होने के बाद भाजपा कार्यकर्ता सीताराम उपाध्याय की मौत के बाद अब यह मामला तूल पकड़ने लगा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय सहित दर्जनों नेता और समाजसेवी मृतक के घर पहुंच कर शोक-संवेदना व्यक्त किए और इस घटना के दोषियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग उठाई लेकिन भाजपा और जिला प्रशासन इस मामले पर मौन है।
पुलिस की बर्बरतापूर्ण इस हरकत से विचलित होकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक कुमार पाण्डेय ने इस केस को पूरी तरह निशुल्क लड़ने का एलान किया है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं , बल्कि यह लोकतंत्र की जड़ों पर सीधा हमला है। संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अगर पुलिस ही जनता की जान लेने लगे, तो यह स्पष्ट रूप से संविधान का हनन है।

उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर क्यों अभी तक दोषी पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुक़दमा दर्ज नहीं हुआ? सिर्फ निलंबन और लाइनहाजिरी किसी भी तरह का न्याय नहीं है। जब तक दोषी पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी नहीं होगी और उन पर हत्या का मुक़दमा नहीं चलेगा, तब तक यह केस अधूरा रहेगा। अधिवक्ता दीपक पाण्डेय का कहना है कि ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट प्रावधान हैं। बिना लिखित आदेश और उचित चेतावनी के लाठीचार्ज अवैध है। अगर किसी की मौत पुलिस बल प्रयोग से होती है, तो संबंधित अधिकारी अपराधिक जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले बताते हैं कि पुलिस को न्यूनतम बल प्रयोग का अधिकार है, न कि अत्यधिक बल प्रयोग का।
उल्लेखनीय है कि गाज़ीपुर के मुहम्मदाबाद तहसील में सेन्ट्रल बार एसोसिएशन के वकीलों ने प्रदर्शन किया और न्यायायिक कार्य से विरत रहते हुए पुलिस अधीक्षक को हटाने और दोषी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने हेतु ज्ञापन दिया।
पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाया है। उन्होंने दोषियों पर कठोर कार्यवाही की मांग की है।
इस घटना ने पूरे जिले की राजनीति को हिला कर रख दिया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस मामले को संज्ञान में लेते हुए दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की थी।
इस मामले का हस्र क्या होगा, इसे लेकर लोगों की निगाहें उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा न्यायालय की कार्रवाई पर लगी हुई हैं कि क्या इस मामले में लिप्त दोषियों पर कार्यवाही होगी,उन पर हत्या का मुकदमा दर्ज होगा या फिर यह मामला भी ठंडे बस्ती में चला जाएगा।
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