देश को ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए आध्यात्मिक शिक्षा जरूरी

गाजीपुर(उत्तर प्रदेश),01 नवम्बर 2019।आज समाज में हो रहे नैतिक पतन के लिए आज की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह उत्तरदायी है। कभी इस देश में शिक्षा ग्रहण करने के लिए देश-विदेश से लोग आते थे,परन्तु आज यहां के लोग शिक्षा ग्रहण करने के लिए विदेश जा रहे हैं। देश को नैतिक पतन से बचाने और समृद्धिशाली व अग्रणी बनाने के लिए देश की पुरातन संस्कृति व संस्कृत भाषा को धारण करने की आवश्यकता है।

उक्त उद्गार प्रसिद्ध सिद्धपीठ हथियाराम मठ के पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी भवाननंदन यति जी महाराज ने मठ परिसर में श्रद्धालु के बीच व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि मानव के विकास के लिए आध्यात्मिक शक्तियों को जागृत करने की आवश्यकता है। बगैर उसके संपूर्ण विकास नहीं हो सकता। प्राचीन समय में आध्यात्मिक धर्मगुरुओं ने जो जानकारियां सूर्य,पृथ्वी व ब्रह्मांड के बारे में दी थी,वह आज भी विज्ञान की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतर रही है। आज तकनीकी युग में कनेक्टिविटी फेल होते ही इंटरनेट, मोबाइल सहित देश की अनेकानेक सेवाएं बाधित हो जाती है, परन्तु आध्यात्मिक शक्तियां से संचालित होने वाले कार्य कभी भी बाधित नहीं होते। आज देश के लोग अपनी संस्कृति और सभ्यता भूल कर पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण कर रहे हैं जो अनुकूल नहीं है। आज अपने भौतिक सुख साधनों की पूर्ति के लिए लोग आचार विचार और वैदिकसंस्कार छोड़ रहे हैं। इससे मानवीय संवेदना का ह्रास हो रहा है, फिर भी वे तनाव और शांति से मुक्ति नहीं मिल रही है। अंत में थक हार कर वे आराधना,उपासना और पूजा पाठ की ओर अग्रसर होते हैं। आध्यात्मिक विकास की जननी बताते हुए महाराज श्री ने कहा कि राष्ट्रीय उन्नयन के लिए वैदिक सनातनी शिक्षा की आवश्यकता है जो गुरुकुल पद्धत में प्रचलित थी। उससे समाज में भाईचारा सहयोग और समर्पण का भाव जागृत होता था। महाराज श्री ने कहा कि कुछ पाने के लिए पहले हमें कुछ खर्च करना पड़ता है, जिस प्रकार भूमि में बीज बोने के उपरांत ही फसल तैयार होती है उसी तरह हमें कुछ पाने से पहले कर्म करना होता है।
आध्यात्मिक तकनीकी पर चर्चा करते हुए महाराजश्री ने कहा कि जब आज की तकनीकी नहीं थी तो भी पुरातन समय में ऋषि महर्षि दूर बैठकर भी बगैर किसी कनेक्टिविटी के लोगों की मन की बात जान लेते थे, वैद्य नाड़ी पकड़कर पूरा रोग बता देते थे, और जब हवाई जहाज नहीं थे तो भी पुष्पक विमान मौजूद था जिसे जमीन पर कभी भी कहीं भी उतारा जा सकता था। उन्होंने कहा कि आज की तकनीकी शिक्षा अभी आध्यात्मिक युग की तकनीकी शिक्षा से काफी पीछे है। आज उसी आध्यात्मिक शिक्षा को आत्मसात कर नियमानुसार उपयोग करने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें सुसुप्तावस्था में जा रहे आध्यात्मिक शक्तियों को जागृत करना होगा ताकि मानव और देश का कल्याण हो सके और देश एक बार फिर विश्व गुरु बन सके।

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Author: Dr. A. K Rai

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