पत्रकारिता हेतु कलम की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और अधिकारों के साथ कानूनी समझ भी जरूरी
एफआईआर से घबराने के बजाय कानून का सहारा लेना जरूरी
बरेली। पत्रकारिता आरम्भ से ही एक कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है। वर्तमान समय में सवाल पूछना और तथ्यों को सामने लाना कई बार चुनौतीपूर्ण हो जाता है। किसी खबर के प्रकाशित होने के बाद पत्रकारों पर शिकायत, नोटिस या एफआईआर सामने आना अब असामान्य नहीं रहा।
उक्त बातें जर्नलिस्ट काउन्सिल ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. अनुराग सक्सेना ने वर्चुअल बैठक में व्यक्त की। कहा गया कि एफआईआर दर्ज होना अपने आप में अपराध सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। ऐसे मामलों में घबराने या जल्दबाजी में प्रतिक्रिया देने के बजाय तथ्यों को समझते हुए वैधानिक रास्ते अपनाना आवश्यक है। हर पुलिस कार्रवाई को गलत मान लेना जितना उचित नहीं है, उतना ही केवल एफआईआर दर्ज होने को अपराध का प्रमाण मान लेना भी सही नहीं है। ऐसे मामलों में यह देखना आवश्यक होता है कि लगाए गए आरोप संबंधित कानून के आवश्यक तत्वों को पूरा करते हैं या नहीं तथा जांच उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ रही है या नहीं।
बताया गया कि ऐसी परिस्थितियों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 महत्वपूर्ण कानूनी उपाय उपलब्ध कराती है, जो पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के समकक्ष है। उपयुक्त परिस्थितियों में इसके तहत उच्च न्यायालय के समक्ष एफआईआर अथवा आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी जा सकती है। हालांकि, किसी मामले में इस प्रावधान का प्रयोग परिस्थितियों और उपलब्ध कानूनी आधार पर निर्भर करता है। केवल आरोप-पत्र दाखिल हो जाने से हर मामले में उच्च न्यायालय की शक्तियां स्वतः समाप्त हो जाती हैं, ऐसा भी नहीं माना जा सकता। वहीं यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि धारा 528 के तहत याचिका दाखिल करने मात्र से गिरफ्तारी पर स्वतः रोक नहीं लगती। परिस्थितियों के अनुसार अग्रिम जमानत, अंतरिम संरक्षण अथवा अन्य वैधानिक उपायों की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए ऐसे मामलों में योग्य अधिवक्ता से समय रहते कानूनी सलाह लेना उपयोगी होता है।
डा. सक्सेना ने कहा कि पत्रकारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात अपने समाचार से संबंधित रिकॉर्ड और दस्तावेजों को सुरक्षित रखना है। खबर कब प्रकाशित हुई, उसके तथ्य किन दस्तावेजों या स्रोतों पर आधारित थे, संबंधित पक्ष का पक्ष जानने के लिए क्या प्रयास किया गया और शिकायत किन आधारों पर की गई—इन सभी का रिकॉर्ड सुरक्षित रहना चाहिए। न्यायिक प्रक्रिया में भावनात्मक दलीलों की अपेक्षा दस्तावेज और ठोस साक्ष्य अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। यदि किसी शिकायत में प्रथमदृष्टया कानूनी आधार का अभाव दिखाई देता है अथवा आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का प्रश्न उठता है, तो उपलब्ध वैधानिक उपायों के संबंध में कानूनी सलाह ली जा सकती है। वहीं, केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर किसी पुलिस अधिकारी या जनप्रतिनिधि को आरोपी ठहरा देना भी उचित नहीं है। किसी व्यक्ति की भूमिका निर्धारित करने के लिए विशिष्ट आरोप और उनके समर्थन में उपलब्ध साक्ष्य आवश्यक होते हैं।
पत्रकार की लड़ाई किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि यदि कोई गलत कार्रवाई हुई हो तो उसके विरुद्ध वैधानिक तरीके से होनी चाहिए। पुलिस से निष्पक्ष जांच की मांग, सरकार से जवाबदेही की मांग और आरोपों के जवाब में शोर के बजाय तथ्य सामने रखना पत्रकारिता की अधिक प्रभावी राह हो सकती है। पत्रकारों को आगाह करते हुए कहा गया कि पत्रकारिता अपराध नहीं है, लेकिन पत्रकारिता कानून से ऊपर भी नहीं है। इसलिए कलम की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और अधिकारों के साथ कानूनी समझ भी जरूरी है। खबर लिखते समय तथ्यपरकता, स्रोतों की विश्वसनीयता, संबंधित पक्ष का दृष्टिकोण और दस्तावेजी आधार पत्रकार की महत्वपूर्ण सुरक्षा बन सकते हैं।
मुकदमा दर्ज होना किसी पत्रकार के लिए अंतिम पड़ाव नहीं है। कई बार यहीं से कानूनी लड़ाई शुरू होती है। ऐसी स्थिति में पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत शोर या दबाव नहीं, बल्कि तथ्य, दस्तावेज, साक्ष्य और कानून की समझ होती है।
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