विश्व टीबी दिवस पर कार्यशाला सम्पन्न
लक्षण प्रकट होने पर इलाज हेतु किया गया जागरूक
गाजीपुर। राजकीय गाजीपुर होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज में प्राचार्य प्रो डॉ राजेंद्र सिंह के निर्देशन में ‘विश्व टी बी दिवस के अवसर पर जागरूकता कार्यशाला सम्पन्न हुई।
कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के सौजन्य से संचालित कार्यक्रम में बताया गया कि हर साल 24 मार्च को वर्ल्ड ट्यूबरकुलोसिस डे (विश्व तपेदिक दिवस) मनाया जाता है। इसका उद्देश्य जन समूह को टीबी के बारे में जानकारी देते हुए जागरूक किया गया ताकि लोगों को इससे बचाया जा सके। बताया गया कि टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है, हालांकि यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है और इसका इलाज एंटीबायोटिक और एंटी ट्यूबर कुलर दवाओं से किया जाता है। समय पर पहचान और सही इलाज से इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। वक्ताओं ने कहा कि समस्या तब होती है, जब पीड़ित इसके शुरुआती लक्षणों को सामान्य खांसी, सर्दी या प्रदूषण का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं और यही लापरवाही बीमारी को गंभीर बना देती है, जिससे अन्य लोगों को संक्रमित होने का खतरा भी बढ़ जाता है।
बताया गया कि इस वर्ष विश्व ट्यूबरक्लोसिस दिवस की थीम ” यस, बी कैन इंड टीबी (हां हम टीबी को खत्म कर सकते हैं) रहा। इस थीम के तहत 2030 तक टी बी को खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है। टीबी के खिलाफ लड़ाई में भारत साल दर साल बड़ी कामयाबी हासिल कर रहा है। साल 2015 में जहां प्रति लाख 237 केस सामने आते थे, वहीं 2024 में ये घटकर 187 रह गया है। खास बात ये है कि ये गिरावट वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी है, जिससे भारत ने दुनिया के सामने एक मजबूत उदाहरण पेश किया है।
वक्ताओं ने कहा कि यदि दो हफ्तों से ज्यादा समय तक लगातार खांसी, सीने में दर्द या भारीपन, खांसी के साथ खून या बलगम आना, लगातार कमजोरी और थकान महसूस होना, बिना वजह तेजी से वजन कम होना, हल्का बुखार और रात में ज्यादा पसीना आना की समस्याएं टीबी के प्रारम्भिक लक्षण हो सकते हैं। इन लक्षणों के मिलने पर हमें सतर्क होने की आवश्यकता है। कहा गया कि कभी कभी कुछ लोगों में टीबी के कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। इस स्थिति को लेटेंट टीबी कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति संक्रमित तो होता है, लेकिन उसे बीमारी महसूस नहीं होती और वो दूसरों को फैलाता रहता है।
मेडिकल के विद्यार्थियों ने इस विषय को गंभीरता से सुना और लाभान्वित हुए। उन्होंने टी बी मुक्त भारत का संकल्प दोहराया। सभी शिक्षकों ने ओपीडी में मास्क के प्रयोग, दीर्घ कालीन हल्का बुखार एवं खांसी के ‘रोगियों की स्क्रीनिंग’ पर चर्चा किया और ऐसे रोगियों को क्लिनिकल पैथोलॉजी लैब में भेजने का सुझाव दिया ताकि टीबी की शीघ्र पहचान हो सके।
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