कवि की नयी रचना – ” उमर मात्र इक गिनती है”

” उमर मात्र इक गिनती है”


पद से बड़ा न बनता कोई कर्म बनाते बड़ा हमें।
उमर मात्र इक गिनती है निज कृत्य बनाते बड़ा हमें।।

चेहरे पर मुस्कान हृदय में वैमनस्य तुम रखते हो।
तुम्हीं बताओ दुनिया वालों कैसे भेष बदलते हो।
था कुंभ करण बलवान बहुत पर ले डूबे निज कर्म उसे।
उमर मात्र इक गिनती है निज कृत्य बनाते बड़ा हमें।।

जो कार्य किए जीवन में तुमने सदा उन्हें गिनवाते हो।
पर दूजे करते कार्य वही तो तुम उनको झुठलाते हो।
बालिराज थे वरदानी पर पर कर्मों का था न भान उन्हें।
उमर मात्र इक गिनती है निज कृत्य बनाते बड़ा हमें।।

छोटा होना है पाप नहीं बहता है रक्त वही रग में।
अवसर मिलने की देरी है छू लेंगे गगन यह क्षण भर में।
शिक्षा लें हम यदुनंदन से छोटे बन काम किए बड़के।
उमर मात्र इक गिनती है निज कृत्य बनाते बड़ा हमें।।

थे भरत राम से छोटे ही पर भ्रात प्रेम की मूरत हैं।
लक्ष्मण सी सेवकाई और त्याग सब तीनों जगत में ढूंढ़त हैं।
गलत व्यक्ति संग चला कर्ण निज शस्त्र बचा न पाए उसे।
उमर मात्र इक गिनती है निज कृत्य बनाते बड़ा हमें।।

मेघनाद अतुलित योद्धा कुल गौरव पत्नी व्रत वाला था।
कुल में तो रावण उत्तम था पर अहंकार का मारा था।
इन दोनों का अंत न होता पर पाप मार्ग पर चले गए।
उमर मात्र इक गिनती है निज कृत्य बनाते बड़ा हमें।।

कहने को अभी बहुत कुछ है पर मर्यादा है शब्दों की।
इन शब्दों की मर्यादा में है छुपी लाज कुछ अपनों की।
अधिकार जताने से पहले धन बल का अहंकार त्यागें।
उमर मात्र इक गिनती है निज कृत्य बनाते बड़ा हमें।।

पद से बड़ा न बनता कोई कर्म बनाते बड़ा हमें।
उमर मात्र इक गिनती है निज कृत्य बनाते बड़ा हमें।।

✍️ कवि अशोक राय वत्स ©®
रैनी, मऊ, उत्तरप्रदेश 8619668341

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