कविता – “कैसे लौटाऊं खुशियाँ”
“कैसे लौटाऊं खुशियाँ”
यौवन के पहले पड़ाव पर,
आज शरारत सूझ रही।
मन में है भरी जो अभिलाषा,
रह रह कर है पूछ रही।
आंखों के सुनहरे सपनों में,
क्यों आज उमंगें मचल रही।
दिल कहता है यह बार बार,
वह रस्ता मेरा है देख रही।
मचल रही हैं आज उमंगें,
मैं भी तो उन संग झूम रहा।
कब पूरे होंगे अरमान मेरे,
मन कब से है यह पूछ रहा।
कब सजेगा वेणी में गजरा,
कब ला पाऊंगा पायल मैं।
मन मोहेगा अब कौन यहाँ,
कैसे लाऊंगा खुशियाँ मैं।
कवि – अशोक राय वत्स
रैनी, मऊ, उत्तरप्रदेश
मो.8619668341
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