पितृ के  प्रति श्रद्धा व समर्पण से जूड़ा है श्राद्ध कर्म : डा. ए.के. राय

गाज़ीपुर। सनातनी परम्परा में पितरों के नाम पर समर्पित पितृपक्ष का आरम्भ आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से और समापन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन अमावस्या के दिन पितृ विसर्जन के पर्व के साथ होता है। 


           पौराणिक मान्यताओं के अनुसार,

आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक पूरे 15 दिन का श्राद्ध पक्ष पूर्वजों के प्रति समर्पण, सम्मान, श्रद्धा एवं आस्था का महापर्व है। इसे श्राद्ध पक्ष के नाम से भी जाना जाता है। इससे पूर्व भाद्रपद की पूर्णिमा को प्रथम श्राद्ध के रूप में उन पूर्वजों का तर्पण किया जाता है, जिनकी मृत्यु पूर्णिमा के दिन हुई हो। सनातन मान्यताओं में श्राद्ध पक्ष में सनातन धर्म के अनुयायी अपने मृत पूर्वजों का स्मरण कर विभिन्न प्रकार के सात्विक व्यंजन बनाकर अर्पण करते हैं।

        सनातनी व पारिवारिक परम्परा के अनुसार, लोग अपने नाम अनाम (ज्ञात-अज्ञात) अपने मृत पूर्वजों (पितरों) को जिनके मृत्यु की वास्तविक तिथि ज्ञात नहीं होती है, उन पितरों का श्राद्ध अमावस्या (पितृ विसर्जन) के दिन धार्मिक मान्यतानुसार विधि विधान से संपन्न करते हैं। सनातनी हिन्दू अपने पूर्वजों की वंशानुगत परम्पराओं एवं मान्यताओं का अनुसरण करते हुए अपनी वर्तमान व भावी पीढ़ी को अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, समर्पण और सम्मान का भाव प्रदर्शित करने की सीख देते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि उनकी मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र भी उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ पितृ पक्ष में पिंडदान और तर्पण करें। पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण में पूर्वजों के नाम से जल, तिल और पिंडदान (चावल के – गोले) अर्पित किए जाते हैं।

      कहा गया कि यदि किसी मृत व्यक्ति का कोई पुत्र न हो तो उसकी पुत्री का पुत्र अपने नाना का श्राद्ध कर्म कर सकता है। यदि मृत व्यक्ति का कोई पुत्र या पुत्री न हो तो उसकी विधवा पत्नी ही अपने पति का श्राद्ध कर सकती है।

    इस पूरे पक्ष में पुत्र सात्विक विचार के साथ सात्विक आहार ग्रहण करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन कर पूरे विधि-विधान के साथ अपने पूर्वजों को तर्पण कर उन्हें संतुष्ट करता है, वह पितृ बाधाओ से मुक्त रहता है। श्राद्ध के माध्यम से ही हम श्रद्धा को कर्म में बदलते हैं।

  पितृपक्ष की गयी अमावस्या के दिन श्राद्ध करने वाले लोग पवित्र नदियों में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर नदी तट पर, अपने पितरों को स्मरण कर उनकी शान्ति के लिए पिंडदान और तर्पण करते हैं। कहा गया है कि यदि श्राद्ध कर्म के लिए योग्य ब्राह्मण उपलब्ध नहीं हो तो व्यक्ति स्वयं भी इस कर्म को पूरा कर सकता है। इसके लिए वह व्यक्ति सूर्य के सम्मुख खड़ा होकर, अपने दोनों हाथों को सामने से उपर करते हुए सूर्य देव से प्रार्थना करे कि हे सूर्य देव, मेरे पिता (पिता का नाम लें), का पुत्र (स्वयं का नाम लें), जाति (अपनी जाति, कुल एवं गोत्र का उच्चारण करें), (अगर जाति, कुल, गोत्र पता न हो तो ब्रह्म गोत्र बोल दें) को आप संतुष्ट रखें। इस निमित्त में आपको अर्घ्य व भोजन देता हूं। ऐसा बोल कर आप सूर्य देव को अर्घ्य दें और भोग लगायें। अपने पुत्र के तर्पण, पिण्ड दान और श्राद्ध करने से उसके पितृ जन वर्ष भर संतुष्ट रहते हैं। पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ जो पुत्र अपने मृत पूर्वजों को पूरे पितृ पक्ष तक नियमित जलांजलि देकर तर्पण करते हैं, उनके वंशज पैतृक दोष के साथ ही दैविक एवं पैशाचिक बाधाओं से भी मुक्ति पा जाते हैं। पितरों के आशीर्वाद से वंशवृद्धि के साथ ही साथ वंश के पितृ दोष नष्ट होते हैं। यहां विशेष ध्यान देने वाली बात यह है कि सनातनी परम्परा के अतिरिक्त अन्य धर्मावलंबियों में भी अपने पूर्वजों को श्रद्धा भाव से याद करने की परम्परा कायम है। पूर्वजों की याद में विश्व के विभिन्न हिस्सों में आयोजनों का प्रचलन है। जैसे प्राचीन काल में मिस्र में “फेस्टिवल ऑफ द डेड” मनाया जाता था। वहां मृतकों की आत्मा की संतुष्टि हेतु स्वादिष्ट भोजन और भेंट दी जाती थी। ईसाई धर्मावलंबी इसे ऑल सेंट्स डे और ऑल सोल्स डे के रूप में मनाते हैं तो वहीं इस्लामिक लोग इसे शबे बारात के रूप में आज भी मनाते हैं। उस दिन वे अपने पूर्वजों की कब्रों की साफ सफाई कर रात में वहां रोशनी कर उन्हें याद कर फातिहा पढ़ते हैं। इसके बाद दुरुद शरीफ पढ़कर अल्लाह से मरने वाले व्यक्ति के लिए मगफिरत (माफी) और रहमत की दुआ करते हैं। इसी प्रकार चीन में पितरों की याद में अप्रैल माह में चिंग मिंग उत्सव या टोंब स्वीपिंग डे मनाया जाता है। वहां के निवासी अपने पूर्वजों की कब्र की साफ सफाई कर भोजन, फल फूल व अन्य वस्तुएँ चढ़ा कर श्रद्धांजलि देते हैं। इसी प्रकार कोरिया में सितंबर- अक्टूबर के महिने में चुसोक मनाते हैं। इस “हार्वेस्ट फेस्टिवल” में लोग अपने पूर्वजों की याद में परिवार संग मिलकर अनुष्ठान कर उन्हें भोजन अर्पण करते हैं। मैक्सिको में यह 1-2 नवम्बर को डे ऑफ द डेड के नाम से मनाया जाता है। लोग अपने पूर्वजों की कब्रों को सजा कर आस पास मोमबत्तियाँ जलाकर रंग-बिरंगे खोपड़ी के प्रतीक और फूलों से सजावट कर उत्सव मनाते हैं। फिलीपींस के लोग अपने पूर्वजों को अरो नग मगा पटाय के रूप में 1 नवंबर को मनाते हैं। परिवार अपने पुरखों की कब्र पर साफ सफाई कर मोमबत्तियाँ जलाकर, पूर्वजों को याद कर वहां उत्सव मनाते हैं। वहीं जापान में पूर्वजों की याद में अगस्त माह में ओबोन उत्सव मनाने की परम्परा है। कहा जाता है कि उन दिनों पूर्वजों की आत्माएँ घर आती हैं, उन्हें प्रसन्न करने हेतु लोग दीपक जलाकर प्रकाश कर, नृत्य (बोन ओडोरी) करते हैं। इसके साथ ही वे मंदिरों में पूजन भी कर पितरों के प्रता श्रद्धा भाव का प्रदर्शन करते हैं।

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