‘हर समय में हँसे धरती’ की समीक्ष के साथ हुआ वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान, कवि गोष्ठी में कवियों ने बिखेरी छटा
सही मायने में पुस्तकें हैं स्मृति चिह्न, इनके शब्द ही बने रहते हैं स्मृतियों में
गाज़ीपुर। द प्रेसिडियम स्कूल के तत्त्वावधान में नगर के आमघाट स्थित सभागार में साहित्यिक संगोष्ठी, पुस्तक समीक्षा, वरिष्ठ साहित्यकार सम्मान और काव्य गोष्ठी सम्पन्न हुई। वरिष्ठ साहित्यकार डा मान्यता राय की अध्यक्षता में आयोजित संगोष्ठी चार सत्रों में सम्पन्न हुई। प्रथम सत्र पुस्तक चर्चा में डॉ मान्धाता राय ने प्रसिद्ध भोजपुरी गीतकार डॉ कमलेश राय की पुस्तक ‘हर समय में हँसे धरती’ की समीक्षा करते हुए इसे विसंगतियों के दौर में मानवीय मूल्यों को बचाने की कवायद बताया। समालोचक साहित्यकार आचार्य शिखा तिवारी ने इस पुस्तक के व्यंग्यात्मक, नारीवादी और सामाजिक सरोकारों को रेखांकित किया। गीतकार डॉ कमलेश राय ने रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए कहा कि मेरी कोई रचना प्रक्रिया नहीं है, जब किसी विषय को लेकर मैं व्यग्र हो जाता हूँ तो रचना स्वतः निकल पड़ती है।
द्वितीय सत्र में सेवानिवृत्ति के बाद भी साहित्य सृजन कर रहे वरिष्ठ साहित्यकारों को रचनाकार संघ द्वारा सम्मानित किया गया। इसमें २४ गंभीर पुस्तकों के सम्पादक लेखक डॉ मान्धाता राय, भारतेंदु हरिश्चंद्र एकांकी पुरस्कार से सम्मानित डॉ गजाधर शर्मा गंगेश, छांदस चेतना के कवि डॉ कामेश्वर द्विवेदी और अंतर्राष्ट्रीय भोजपुरी गीतकार डॉ कमलेश राय को अंगवस्त्रम और पुस्तकें देकर सम्मानित किया गया। सम्मानित करने वालों में समाजसेवी अमरनाथ तिवारी अमर, शिक्षिका शिप्रा श्रीवास्तव, अध्यापक सीताराम राय और आचार्य अजय राय रहे। संयोजिका पूजा राय ने अपने सम्बोधन में कहा कि पुस्तकें ही सही मायने में स्मृति चिह्न हैं क्योंकि इनके शब्द ही स्मृतियों में बने रहते हैं। तृतीय सत्र में ‘हिन्दी की राजभाषा के रूप में चुनौतियाँ’ विषय पर विचार रखते हुए सेवानिवृत्त बैंकर और प्रखर वक्ता डॉ महेश चन्द्र लाल जी ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती हम सभी नागरिक स्वयं हैं क्योंकि हम में से ही लोग प्रशासन, राजनीति, विद्यालय इत्यादि में जाकर हिन्दी की उपेक्षा करते हैं. अंग्रेजी पढ़ी जानी चाहिए लेकिन यदि अंग्रेजी को दिया जाने वाला सम्मान कुछ दक्षिण भारतीय भाषाओँ को मिला रहता तो दक्षिण भारतीय भी हिन्दी भाषा का सम्मान करते।
अंतिम सत्र में कवयित्री पूजा राय ने ये पंक्तियाँ सुनाकर लोगों को सोचने पर विवश किया, “कितनी ठहर बची है इस भागमभाग के बीच/ नहीं बची तो बचा लेना है/ थोड़ी मिट्टी/ थोड़ी धूप/ थोड़ा बदल थोड़ा पानी/ थोड़ा पहाड़ खुद में भी.” कवयित्री रिम्पू सिंह ने “संशय से संदेह नीपजे करे आस्थाहीन./ जो शक को पोषित करे/ रहे प्रगति विहीन.” कवि आशुतोष श्री ने प्रश्न उठाया, “जो करने को आतुर है किसी का परिहास./ क्या ऐसे साहित्यकार से बची है सृजन की कोई आस?” व्यंग्य कवि विजय मधुरेश ने कहा, “झील नदियाँ मेघ सब देखो तरसते देश में./ सिवा नेता के हमारे कौन हंसता देश में.” कवि दिनेश चन्द्र शर्मा ने कहा, “आओ पहले तूफानों से निपट लें/ फिर बैठ कर अपने मुद्दे सुलझाएंगे.” आलोचक माधव कृष्ण ने असंवैधानिक रूप से बाबरी ढांचा गिराए जाने के बाद पैदा हुए विद्वेष पर कहा, “तुम्हारी नफरतों का द्वेष का आधार कुछ भी हो/ विषैली रंजिशों का ऐतिहासिक भार कुछ भी हो/ यही सच है भरोसा मोहब्बत बलिदान लेती है/ हो बिस्मिल या कि फिर अशफाक इम्तेहान लेती है। इसी क्रम में कवयित्री शीला सिंह, कवि हरिशंकर पाण्डेय, कवयित्री शालिनी श्रीवास्तव, कवि गंगेश व कामेश्वर द्विवेदी और गीतकार डॉ कमलेश राय ने अपनी रचनाओं से गोष्ठी को बुलन्दियों पर पहुंचाया। धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ श्रीकांत पाण्डेय ने किया। कार्यक्रम का संचालन लेखक विचारक डॉ माधव कृष्ण ने किया
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