सिद्धपीठ हथियाराम मठ जहां पूरी होती है भक्तों की मनोकामना 

गाजीपुर (उत्तर प्रदेश)। जखनियां तहसील क्षेत्र के सिद्धपीठ हथियाराम मठ की परंपरा लगभग 700 वर्ष पुरानी है। मां जगदजननी जगदम्बा के प्रसिद्ध सिद्धपीठों में शुमार है। इस पीठ पर आसीन होने वाले संत यति सन्यासी कहे जाते हैं। इस गद्दी की परंपरा दत्तात्रेय, शुकदेव तथा शंकराचार्य से प्रारंभ होती है। मठ का प्रमाण सामान्य जनश्रुति, प्राचीन हस्तलिपि, लिखित पुस्तक तथा भारतीय इतिहास में मिलता है। श्री सिंह श्याम यति से इस पीठ की संत परंपरा प्रारंभ हुई। कालांतर में बालकृष्ण यति 1954 में हथियाराम मठ के 25 वें महंथ बने। उत्तराखंड में जन्मे बालकृष्ण यति बाल ब्रह्मचारी बने तथा अध्ययनकाल से ही शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी के साथ रहे। बाल्यकाल से ही अलौकिक प्रतिभा के धनी यति जी ने कठिन साधना, हठयोग, समाधि तथा तपस्या से अध्यात्म जगत में महत्वपूर्ण स्थान बनाया। इनके प्रताप तथा सद्मार्ग की देन रही है कि आज जूना अखाड़े में पांच महामंडलेश्वर बालकृष्ण यति, भवानीनंदन यति, परेशानंद यति, आत्मप्रकाश यति तथा सोमेश्वर यति हाथियाराम मठ से है। इस प्रसिद्ध सिद्धपीठ की शाखाएं देश के विभिन्न प्रान्तों तक फैली हुई हैं। कहा जाता है कि आध्यात्मिक शक्तियों से परिपूर्ण इस मठ में सच्चे मन से की गई पूजा व मनौती कभी व्यर्थ नहीं जाती।


         सिद्धपीठ हथियाराम में अधिष्ठात्री देवी वृद्धम्बिका माता (माता के वृद्धावस्था रुप) के रूप में स्थापित हैं। इस मठ परंपरा से जुड़े देश-विदेश में लाखों शिष्य हैं। वर्तमान समय में मठ के 26 वें पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी श्री भवानी नन्दन यति जी महाराज आध्यात्मिक शक्तियों से परिपूर्ण, सनातनी परम्परा के वाहक, सामाजिक चेतना के अग्रदूत हैं। जिनके देखरेख में मठ उत्तरोत्तर वृद्धि की ओर अग्रसर है। कहा जाता है कि मठ की अधिष्ठात्री बुढ़िया माता का दर्शन और भभूत की मालिश करने से लकवा के रोगी ठीक हो जाते हैं।         यह मठ का प्रताप है कि अब तक इस मठ पर विभिन्न राजनीतिक हस्तियां, कई प्रान्तों के राज्यपाल तथा आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी आकर मत्था टेक चुके हैं। कुछ वर्ष पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परिवारीजन भी यहां आकर माता का पूजन दर्शन कर मत्था टेक चुके हैं।

      जिले के मनिहारी क्षेत्र के हरिहरपुर गांव में स्थापित मां काली धाम मन्दिर इसी मठ की शाखा है जहां माता के तीन स्वरूप के दर्शन होते हैं। कहा जाता है कि मन्दिर में पहले माता की एक ही प्रतिमा मौजूद थी जो पचासों गांवों की कुलदेवी हैं। उस प्रतिमा के खण्डित होने पर जब नयी प्रतिमा लाकर उसे लगाने का प्रयास किया गया तो वहां छत से खुन टपकने लगा। तब वर्तमान पीठाधीश्वर ने उसे रुकवा दिया और एक नयी प्रतिमा और मंगाई गयी। इस प्रकार वहां तीन प्रतिमाएं महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में विराजमान हैं। इसके साथ ही हरिद्वार के ज्वालापुर में शंकर आश्रम, इंदौर में विश्वनाथ धाम, हल्द्वानी में महालक्ष्मी अष्टादास का विख्यात मंदिर सहित वाराणसी में चार, बलिया, मऊ के साथ ही हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, बिहार आदि प्रांतों के साथ ही विदेशों में भी आश्रमों में बड़ी संख्या में शिष्य है। पूजन अर्चन, तपस्या व सनातनी धर्माथ संदेश को लेकर पीठाधीश्वर महाराज श्री ने विदेश में भी चातुर्मास कर धर्मध्वजा फहराई है। आज भी नवरात्रि महोत्सव,श्रावणी महोत्सव, शिवरात्रि महोत्सव, छठ पूजनोत्सव, यज्ञ पूजन तथा चातुर्मास महायज्ञ में देश विदेश के श्रद्धालु जन आकर माता का पूजन अर्चन कर तथा महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त कर अपने को धन्य करते हैं।

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