कविता ! रचनाकार की नजर में

मुम्बई, 03 दिसम्बर 2019। कविता कोई मजाक, मसखरी या मनोरंजन का साधन नहीं है। इससे हास्य पैदा हो जाय, यह अलग बात है। लेकिन वह आनंद तक सीमित हो,मसखरी न बने।
दरअसल कविता एक सोचा, समझा, विचारा संघर्ष है। इसलिए कविता एक अभियान है, जिसकी उत्पत्ति करुणा से होती है। करुणा से ही संवेदना का जन्म होता है, जहाँ करुणा या संवेदना नहीं, वहाँ कविता नहीं। यह करुणा या संवेदना सदैव अनायास मार खानेवाले के पक्ष में और मारने वाले के विरोध में होती है। यद्क्रौंच मिथुना अवधीत् काममोहितम्। यही उत्पत्ति स्थल है कविता का। जो कविता दमित के पक्ष में (स्त्री,पुरुष,घर,समाज,जिला,प्रांत, देश,विश्व समाज व मानवता) खड़ी होती है, हस्तक्षेप करती है और प्रतिरोध करती है। डॉ.रामविलास शर्मा ने कहा था प्रतिरोध ही सौंदर्य है। यही प्रतिरोध ही कविता की जिंदगी है, जो दमन और अत्याचार के खिलाफ दमित की आवाज बनती है और कलात्मक भाषा शैली में प्रकट होकर लोगों के दिलों में जाती है,जगाती है, एकजुट करती है और संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए शांति स्थापना तक जाती है। शांति स्थापना भी एक संघर्ष है, जो कविता के दायरे में आता है, कविता इंसानियत का बीज बोलकर समाज राष्ट्र और मानवता की सेवा करती है। तब जाकर कविता का दायित्व खत्म होता है, अन्यथा कविता आधी है, अधूरी है। लेकिन मानवता के पक्ष में संघर्षरत है तो ही वह कविता है। शेष को कविता कहने पर सौ बार सोचने की आवश्यकता है । कृपया कवि कर्म धर्म को निभाएँ और उत्तम कवि बनें
✍️ हौशिला प्रसाद अन्वेषी


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