नवसंवत्सर व बासंतिक नवरात्रि

         भारतीय परम्परा में नव संवत्सर का विशेष है। इसी दिन को ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रचना का प्रतीक माना जाता है। इसी दिन से विक्रम संवत का आरंभ होता है, जो भारतीय कालगणना का आधार है। यह समय प्रकृति, वातावरण और मानव के बीच सामंजस्य स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है। इस अवसर पर भारतीय जनमानस में विशेष उत्साह और उल्लास रहता है। मकानों व मन्दिरों की साफ सफाई, दीप प्रज्वलन, व्रत और पूजा-अर्चना के माध्यम से लोग अपने जीवन में सकारात्मकता का बोध करते हैं। यह आत्ममंथन और आत्मसुधार का भी श्रेष्ठ अवसर है। मातृ मंदिरों में विशेष दैवीय अनुष्ठान होते हैं, भजन-कीर्तन व वैदिक मंत्रों की गूंज से वातावरण में आध्यात्मिकता का पुट होता है। इससे आपसी प्रेम, सौहार्द तथा सामाजिकता की भावना सुदृढ़ होती है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह समय आत्मा के जागरण का पर्व है। 


          हिंदू नववर्ष का शुभारंभ चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से ही होती है। इसी शुभ दिन से चैत्र नवरात्रि का पवित्र त्योहार भी आरंभ होता है। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष के पहले दिन से ही मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना का पर्व आरंभ होता है।

      इस वर्ष 19 मार्च 2026 को चैत्र प्रतिपदा से नवरात्रि आरंभ हो रही है। आज के दिन घटस्‍थापना होगी। 

            इस वर्ष चैत्र नवरात्रि का आरंभ 19 मार्च से हो रहा है हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि क घट स्थापना के लिए चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन मिट्टी का कलश लेकर उसे शुभ मुहूर्त में ईशान कोण में साफ जगह पर स्थापित करें। घट स्थापना से पहले थोड़े से चावल डालें इसके बाद कलश इसके ऊपर रखें कलश में सिक्का डाल कर उसमें शुद्ध जल भरें और कलश के ऊपर एक लाल चुनरी से नारियल बांधकर रखें। कलश पर कलावा बांधें और स्वास्तिक बनाएं। 

           चैत्र नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि में मां शैलपुत्री, द्वितीया तिथि में मां ब्रह्मचारिणी, तृतीया तिथि में मां चंद्रघण्टा, चतुर्थी तिथि में मां कुष्माण्डा, पंचमी तिथि में मां स्कंदमाता, षष्ठी तिथि में मां कात्यायनी, सप्तमी तिथि में मां कालरात्री, अष्टमी तिथि में मां महागौरी तथा नवमी तिथि में मां सिद्धीदात्री का पूजन अर्चन करना चाहिए।

       नवरात्रि में नौ देवियों के बीज मंत्र का जाप करना चाहिए। ये बीज मंत्र निम्नलिखित हैं – शैलपुत्री: ह्रीं शिवायै नम:.  ब्रह्मचारिणी: ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:.

ब्रह्मचारिणी: ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:.

चन्द्रघण्टा: ऐं श्रीं शक्तयै नम:.

कूष्मांडा: ऐं ह्री देव्यै नम:.

स्कंदमाता: ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम:.

कात्यायनी: क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम:.

कालरात्रि: क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम:.

महागौरी: श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:.

सिद्धिदात्री: ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:.

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