*विश्व गौरैया दिवस – फिर आई एक याद पुरानी*

गौरीशंकर पाण्डेय सरस
मुझे भलीभांति याद है कि मैं बहुत छोटा था फिर भी इतना नहीं की कुछ याद न रहे। खैर बचपना तो था ही लेकिन इतना याद है कि मैं प्राथमिक पाठशाला का विद्यार्थी था। बचपना का चंचलपन और पिता द्वारा ग्राह्य संस्कार दोनो का अभूतपूर्व सामंजस्य मेरी चिंता से परे था।कच्चा मकान का छाजन गर्मी के दिनों में गौरैया चिड़िया को अपना घोंसला बनाने के लिए कोई दूसरा स्थान उम्दा नहीं हो सकता था। इसलिए कि कच्चा मकान का खुला बैठका पर मानो गौरैया का एक छत्र कब्जा था। गौरैया का घोंसला आज के किसी इलेक्ट्रॉनिक हवादार उपकरण से कम नहीं था। बहुत बेहतरीन तरीके से चुन चुन कर बनाया गया गौरैया का घोंसला पंछी समाज के प्रशिक्षित इंजीनियरिंग का पुख्ता सबूत था। घोंसला के भीतर से चींचीं करती मीठी आवाज बर्बस मन को लुभाती थी। जिससे प्रभावित होकर हम घर के सभी मासूम मुकम्मल दाना पानी का इंतजाम कर सेवा में समर्पित रहा करते थे।न जाने कितनी चिड़िया रानी पर तरह तरह की कविताएं हम लोगों द्वारा रट लीगई थी कोई गिनती नहीं थी।घर के आंगन से लेकर कर गांव के सघन बाग बागीचे में मिट्टी के बर्तन में जल का प्रबंध मानो जिम्मेदारी बन गई थी। पिताजी हम बच्चों के नेक इरादे और पुण्य कार्य के लिए पारितोषिक के तौर पर खुश होकर बीस पैसे से से लेकर चार आने तक दिया करते थे जो हम बच्चों के लिए पर्याप्त था। आसानी से पांच पैसे में रोल रबर और स्याही का काम हो जाता था इसके बाद बाकी पैसा बर्फ़ और लेबंचूस खाने को महीनों चल जाया करता था।
कभी कभी तो पालतू चिड़िया गौरैया के बदल जाने के डर से हम लोग रंग बिरंगे रंगों से रंग दिया करते थे ताकि अपनी प्यारी चिड़िया पहचान में आ सके।
अब दुखद पहलू यह‌ है कि अब न तो कच्चा घर का छाजन रहा और न तो गौरैया का झुंड।साथ ही पंछियों के प्रति कोमल भावनाओं का अभाव भी चिड़ियों के पलायन में सहायक बना।


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