त्याग करूणा और श्रद्धा की त्रिवेणी – भवानीनन्दन यति का आविर्भाव दिवस कल’


गाजीपुर। सिद्धपीठ हथियाराम के महन्थ पूज्यपाद, प्रातः स्मरणीय महामण्डलेश्वर स्वामी श्री भवानीनन्दन यति महाराज का अवतरण दिवस भादों मास के शुक्लपक्ष अष्टमी (राधाष्टमी) तिथि अर्थात 14 सितम्बर को समारोह पूर्वक मनाया जाता है। श्रीयति जी का जन्म देवभूमि उत्तराखंड में हुआ था किंतु पूर्व आश्रम में आपने वेद और व्याकरण की शिक्षा गुरुकुल पद्धति से काशी में रहकर प्राप्त की। हथियाराम मठ के तत्कालीन महन्थ स्वामी बालकृष्ण यति जी का सानिध्य और आशीर्वाद आपको प्राप्त हुआ। 26वें पीठाधीश्वर के रूप में सिद्धपीठ हथियाराम गाजीपुर की धरती पर 23 फरवरी 1996को आपका आगमन हुआ। भारतवर्ष में विभिन्न स्थानों पर ऋषियों मुनियों ने साधना की है।



काशी परिक्षेत्र में स्थित यह आध्यात्मिक केंद्र भी लगभग आठ सौ वर्षों से अपनी आभा विखेर रहा है। समय समय पर यहां दिव्य आत्माओं का जगत कल्याणार्थ अभ्युदय हुआ और उन्होंने पारम्परिक तरीके से जन सामान्य के बीच जाकर सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा दी। हमारे यहां ऋषि शब्द अत्यधिक प्रचलित है। ऋषि वह व्यक्ति है जिसने अनुभूति से जाना हो अर्थात रियलाइजेशन या साक्षात्कार किया हो। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार क्या करना है और क्या नहीं करना है इसके लिए शास्त्र प्रमाण हैं ‘तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ’ लेकिन शास्त्र के लिए प्रमाण अनुभूति है, जिन्हें अनुभूति नहीं हुई उनको बताने समझाने का कार्य ऋषियों ने और उनके द्वारा रचे गए शास्त्रों ने किया है।
भवानीनन्दन यति जी एक सिद्ध साधक और अनुभोक्ता के रूप में धर्म संस्कृति को बचाने और बनाये रखने हेतु सतत प्रयत्नशील हैं। स्वामी भवानी नन्दन यति जी महाराज त्याग, करुणा और श्रद्धा की त्रिवेणी हैं। आपने अथक परिश्रम से गौरवशाली परम्परा का निर्वहन करते हुए समाज को दिशा देने का यत्न किया है।उनका मानना है कि विद्वत्ता प्राप्त करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है हम सज्जनता को अंगीकार करें। जिस कार्य को रावण शास्त्र का ज्ञाता होते हुए भी नहीं कर सका उसे शबरी ने सहज प्राप्त कर लिया। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार आदि शंकराचार्य ने अखाड़ों को बनाया तथा साधुओं और सन्यासियों को कुछ अखाड़ों में बांटा गया। जूना अखाड़ा सबसे बड़ा अखाड़ा है। इस अखाड़े में सन्यासियों की संख्या चार लाख से भी ज्यादा है। स्थापना के समय अखाड़ों का मुख्य उद्देश्य देश के प्राचीन मंदिरों और धार्मिक लोगों को अन्य धर्मों के आक्रमणकारियों से बचाना था।भवानीनन्दन यति जी जूना अखाड़े के वरिष्ठ महामण्डलेश्वर के रूप में राम मंदिर आंदोलन की गतिविधियों से जुड़े रहे और आज भी सनातन धर्म की ध्वजा लेकर धार्मिक अनुष्ठानों द्वारा देश के कोने कोने में भटके हुए लोगों को मानवता की राह दिखा रहे हैं। उनका अवतरण दिवस मठ के अनुयायियों के लिए एक उत्सव का दिन है। स्वामी भवानीनन्दन यति जी का आध्यात्मिक व्यक्तित्व अत्यंत प्रिय एवं विशाल है। ईश्वर एवं धर्म के प्रति रागात्मक वृत्ति बनाये रखने में इनका सानिध्य दीर्घ काल तक प्रेरणादायी बना रहे।

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