“गरजी विरांगना”

“गरजी विरांगना”


देऊंगी न झांसी कभी,गरजी विरांगना तो,
गोरे पहचान गए, डिगा नहीं पाएंगे।

अश्व पर सवार हो, शेरनी सी लपकी जो,
अरि दल मान गया,भगा नहीं पाएंगे।

दोनों हाथ असि लेके, काटने लगी जो मुंड,
शत्रुओं ने सोच लिया,पार नहीं पाएंगे।

बन रण चंडी रानी, रौंदने लगी जो सेना,
डलहौजी बोल पड़ा, हरा नहीं पाएंगे।

कवि, अशोक राय वत्स ©® रैनी, मऊ, उत्तरप्रदेश 8619668341

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