दक्षिण मुखी मां काली प्रतिमा का है विशेष स्थान

नवरात्र में पूजन अर्चन से बढ़ती है शरीर की सकारात्मक ऊर्जा


गाजीपुर। सिद्धपीठ हथियाराम मठ की शाखा कालीधाम हरिहरपुर में स्थित मां काली मंदिर श्रद्धालुओं के आस्था का केन्द्र है। मंदिर में स्थापित मां काली की तीन मूर्तियां अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।
वासन्तिक नवरात्र में कालीधाम हरिहरपुर में पीठाधिपति स्वामी भवानीनन्दन के संरक्षकत्व में चल रहे अनुष्ठान के दौरान वाराणसी के विद्वजन जहां मंत्रोच्चार के बीच हवन कुण्ड में आहूति दे रहे हैं, तो कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करते हुए पहुंच रहे श्रद्धालु यज्ञ मंडप की परिक्रमा करके पुण्य लाभ के भागी बन रहे हैं।

प्रसिद्ध शक्ति सिद्धपीठ हथियाराम मठ के पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी भवानी नंदन यति जी महाराज ने कहा कि जन स्वास्थ्य को संक्रमण से बचाने के लिए शासन प्रशासन द्वारा जारी दिशा निर्देशों का हम सभी देशवासियों को पालन करने की आवश्यकता है।
बासंतिक नवरात्र पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यह समय माता भगवती की आराधना और उपासना के लिए अत्यन्त शुभ माना जाता है। चैत्र माह में प्रकृति भी आह्लादित होती है। हर तरफ नये जीवन का, एक नई उम्मीद का बीज अंकुरित होने लगता है। नवीनता युक्त इस मौसम में प्राणियों में एक नई उर्जा का संचार होता है। लहलहाती फसलों से उम्मीदें जुड़ी होती हैं। सूर्य अपने उत्तरायण की गति में होते है। इस समय मां भगवती की आराधना, पूजन अर्चन करने से विशेष अनुभूति होती है और शरीर में नव स्फूर्ति का संचार होता है।
महाराज श्री ने कहा कि आज आवश्यकता है कि लोग अपने घरों में रहकर मां भगवती की आराधना, साधना और भजनपूजन और हवन करें। हवन पूजन से निकली सुगंध से हानिकारक जीवाणुओं का नाश होता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
मंदिर में स्थापित दक्षिणामुखी मां काली की प्रतिमा की महत्ता का वर्णन करते हुए स्वामी भवानीनन्दन यतिजी महाराज ने बताया कि मंदिर में स्थापित पहली दक्षिणमुखी प्रतिमा शव के ऊपर स्थापित है। इस मूर्ति के बारे में अपने गुरूजी महाराज द्वारा सुनी कथा का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि सैकड़ों वर्ष पूर्व स्थापित इस प्रतिमा की एक अंगुली किसी कारणवश टूट गयी। यह जानकारी होने पर उनके गुरूजी महाराज ने खण्डित प्रतिमा के स्थान पर दूसरी प्रतिमा स्थापित कराने की मंशा के तहत प्रतिमा हटाने का काम शुरू कराया। जब मजदूरों ने प्रतिमा हटाना शुरू किया, वैसे ही मंदिर के छत से रक्त टपकने लगा। यह देखकर मजदूर काम रोक दिये और विश्राम कर रहे गुरू को भी इस बात का अनुभव हुआ और वह तुरंत मंदिर की तरफ दौड़ पड़े। स्वामी भवानीनंदन यति ने बताया कि गुरुजी महाराज ने खण्डित प्रतिमा के स्थान पर दूसरी प्रतिमा स्थापित कराने के लिए नई प्रतिमा मंगा रखी थी, उसे इसी प्रतिमा के ठीक बगल में स्थापित करा दिया गया। दो प्रतिमा होने के बाद तीसरी प्रतिमा की स्थापना कराया जाना अपरिहार्य हो गया। फलस्वरूप श्वेत प्रतिमा की स्थापना करायी गयी। यह तीनों प्रतिमाएं मां के तीनों रूप महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के रूप में स्थापित हैं। इनके पूजन अर्चन से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।

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