वासंतिक नवरात्र 13 अप्रैल से….

गाजीपुर(उत्तर प्रदेश)। नव सम्वत के प्रथम माह
चैत्र में पड़ने वाली नवरात्रि का विशेष महत्व होता है। धर्म ग्रंथों, पुराणों के अनुसार चैत्र नवरात्रों का समय बहुत ही शुभ माना जाता है। इस समय प्रकृति भी आह्लादित होती है। हर तरफ नये जीवन का, एक नई उम्मीद का बीज अंकुरित होने लगता है। मादकता भरे मौसम में वातावरण व जीवन में एक नई उर्जा का संचार होता है। लहलहाती फसलों से उम्मीदें जुड़ी होती हैं। सूर्य अपने उत्तरायण की गति में होते हैं। इस समय मां जगदम्बा की आराधना, पूजन अर्चन करने से विशेष अनुभूति होती है क्योंकि बसंत ऋतु अपने यौवन पर होती है इसलिये इन्हें वासंतिक नवरात्र भी कहा जाता है।
हिन्दू धर्म ग्रन्थों के अनुसार प्रत्येक वर्ष में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ महीनों में चार बार नवरात्रि आती है। इसमें चैत्र और आश्विन माह की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक चलने वाले नवरात्रि ही विशेष मानी जाती है। इन्हीं दोनों नवरात्रि को जगतजननी मां भगवती की आराधना के लिये श्रेष्ठ माना जाता है।
नवरात्र के समय जहां मां के नौ रुपों के पूजन अर्चन का विधान है, वहीं चैत्र नवरात्र के दौरान मां की पूजा के साथ-साथ अपने कुल देवी-देवताओं की भी पूजा अर्चना की जाती है जिससे ये नवरात्र विशेष हो जाता है।
इस वर्ष चैत्र नवरात्र मंगलवार 13 अप्रैल से आरम्भ होकर पूरे नौ दिनों तक मनाया जायेगा और समापन 21 अप्रैल को होगा। चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू हो रहे नवरात्र में चंद्रमा मेष राशि में रहेगा। इस अवसर पर अश्वनी नक्षत्र व स्वार्थसिद्ध और अमृतसिद्ध योग बन रहे हैं। अमृतसिद्धि योग में कार्य शुरू करने पर शुभ फल मिलता है तो वहीं स्वार्थ सिद्धि योग में जो भी कार्य किए जाते हैं वह बाधारहित पूर्ण होते हैं।
कलश स्थापना मुहूर्त
इस वर्ष चैत्र की प्रतिपदा तिथि 13 अप्रैल को प्रातः 08:47 तक होगी। कलश स्थापना 13 अप्रैल मंगलवार को प्रातः 08:47 बजे तक कर लेना चाहिये। महाअष्टमी का व्रत मंगलवार 20 अप्रैल को होगा। रामनवमी 21 अप्रैल वुधवार को होगी। और मध्यान्ह में कर्क लग्न में श्रीराम जन्म महोत्सव होगा। नौ दिवसीय व्रत की पारणा 22 अप्रैल गुरुवार को होगी।
इस वर्ष मातारानी का आगमन घोड़े पर हो रहा है जो शुभ नहीं है। घोड़े पर मां के आने से देश में राजनैतिक उथल-पुथल और प्रजा तथा सैनिक को कष्ट संभव है। भय और द्वंद्व की स्थिति बनी रहेगी। इसके साथ ही माता का गमन डोली पर होने से देश में शुभता और सुख शांति का आगमन होगा।
इसमें माता दुर्गा के नौ रूपों की विशेष विधि-विधान से पूजा की जाती है। नवरात्रि के प्रथम तिथि को सभी श्रद्धालुजन कलश स्थापित कर पूजा की शुरूआत करते हैं। मां दुर्गा के नौ रूपों को तीन भागों में वर्णित किया गया है। पहले तीन दिन भक्त मां जगतजननी जगदम्बा (दुर्गा), मध्य के तीन दिन धन की देवी मां लक्ष्मी तथा अंतिम तीन दिन ज्ञान की देवी मां सरस्वती के रूपों की पूजा आराधना करते हैं। निर्मल मन से इनके पूजन अर्चन से विशेष फल की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि नवदुर्गा के यह रुप एक स्त्री के पूरे जीवनचक्र का प्रतिबिम्ब है। जिसमें जन्म ग्रहण करनेवाली कन्या “शैलपुत्री” का स्वरूप होती हैं तो जन्मोपरांत कन्या अपनी कौमार्य अवस्था तक “ब्रह्मचारिणी” का रूप होती हैं। यौवनावस्था में विवाह से पूर्व वह चंद्रमा के समान निर्मल होने से “चंद्रघंटा” समान होती हैं तो वहीं शीशु को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह “कूष्मांडा” स्वरूप होती हैं। संतान के जन्मोपरांत वही स्त्री “स्कन्दमाता” बन जाती हैं और फिर संयम व साधना को धारण कर वही स्त्री “कात्यायनी” रूप में हो जाती हैं। अपने दृढ़ संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीतने की सामर्थ्य से वह “कालरात्रि”का रुप धारण करती हैं। इसके उपरांत अपने परिवार को ही अपना संसार मानकर उनका उपकार करने से वह “महागौरी” स्वरूप हो जाती हैं और फिर पृथ्वी छोड़कर स्वर्ग प्रस्थान करने से पूर्व अपनी संतान को समस्त सुख-संपदा का आशीर्वाद देने वाली स्त्री “सिद्धिदात्री” स्वरुपा हो जाती हैं।


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