शारदीय नवरात्रि महापर्व – आन्तरिक शक्ति को सक्रिय करने का है  महापर्व

गाजीपुर। हिंदू धर्मशास्त्रों में व्रत त्यौहारों को विशेष स्थान दिया गया है। सभी व्रत त्यौहारों में वैज्ञानिकता छिपी हुई है। कहा जाता है कि हमारे ऋषि गण प्राचीन समय के उच्च कोटिय विद्वान व वैज्ञानिक रहे और उसके आध्यात्मिक ज्ञान, गणना व उपदेश आज भी उतने ही समाजोपयोगी हैं। उनकी सनातनी परम्परा व त्यौहार काल, समय और प्रकृति के नजदीक हैं। प्राकृतिक ऋतु परिवर्तन के समय शरीर की आन्तरिक रोग प्रतिरोधक शक्तियां कमजोर हो जाती हैं। शरीर की कमजोर पड़ रही आन्तरिक शक्तियों को तरोताजा करने या यों कहें कि रिचार्ज करने के लिए व्रत व त्योहारों का विशेष महत्व है।
नवरात्रि का व्रत, पूजन-अर्चन, साधना- उपासना और भजन के माध्यम से मातृशक्ति को समर्पित पर्व है। मातृशक्ति को समर्पित जगदजननी जगदम्बा के विशेष पर्व “नवरात्रि” को हिन्दू श्रद्धालुओं में विशेष महत्व दिया गया है। नवरात्रि में व्रत, पूजन-अर्चन, साधना- उपासना और जागरण के माध्यम से मां की पूजा होती है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार वर्ष की 36 रात्रियां अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, जिनमें चारों नवरात्रि की रात विशेष होती हैं। इसमें पहला चैत्र नवरात्र जिसे “वासंतिक नवरात्र” तथा दूसरा अश्विन माह का नवरात्रि “शारदीय नवरात्रि” होता है। आषाढ़ और पौष माह की नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है।
बताया गया है कि मानव शरीर में नौ प्रमुख वाह्य छिद्र होते हैं। जिसमें दो आंख, दो कान,नाक के दो छेद, दो गुप्तांग और एक मुंह होता है।नींद में यह सभी इंद्रियां सुप्तावस्था में रहती हैं और सिर्फ मन ही जागृत रहता है। व्रत और उपवास रखने से अंग प्रत्यंगों की आंतरिक सफाई हो जाती है, क्योंकि इन नौ दिनों में सात्विक भोजन और सात्विक रहन-सहन के कारण चित्त शांत रहता है।
शरीर के उपरोक्त सभी अंगों को पवित्र और शुद्ध रखने से मन पवित्र व चित्त निर्मल होता है और छठी ज्ञानेन्द्री जागृत और सक्रिय होती है।
शास्त्रों में नवरात्रि के पवित्र दिनों में माता जगदम्बिका के नौ रुपों की आराधना का विधान है। नवरात्रि के प्रथम दिन शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन चंद्रघंटा, चौथे दिन कूष्मांडा, पांचवे दिन स्कंदमाता, छठे दिन कात्यायनी, सातवें दिन कालरात्रि, आठवें दिन महागौरी व नौवें दिन सिद्धिदात्री का पूजन अर्चन विधि विधान से किया जाता है।
शारदीय नवरात्र की शुरुआत अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होती है। यह पर्व नौ दिनों तक मनाया जाता है। इसमें माता दुर्गा के नौ रूपों की विशेष विधि-विधान से पूजा की जाती है। नवरात्रि के प्रथम तिथि को सभी श्रद्धालुजन कलश स्थापित कर पूजा की शुरूआत करते हैं। मां दुर्गा के नौ रूपों को तीन भागों में वर्णित किया गया है। पहले तीन दिन श्रद्धालु जन मां जगतजननी जगदम्बा (दुर्गा), मध्य के तीन दिन धन की देवी मां लक्ष्मी तथा अंतिम तीन दिन ज्ञान की देवी मां सरस्वती के रूपों की पूजा आराधना करते हैं। निर्मल मन से इनके पूजन अर्चन से विशेष फल की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि नवदुर्गा के यह रुप एक स्त्री के पूरे जीवनचक्र का प्रतिबिम्ब है। जिसमें जन्म ग्रहण करनेवाली कन्या “शैलपुत्री” का स्वरूप होती हैं तो जन्मोपरांत कन्या अपनी कौमार्य अवस्था तक “ब्रह्मचारिणी” का रूप होती हैं। यौवनावस्था में विवाह से पूर्व वह चंद्रमा के समान निर्मल होने से “चंद्रघंटा” समान होती हैं तो वहीं शीशु को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह “कूष्मांडा” स्वरूप होती हैं। संतान के जन्मोपरांत वही स्त्री “स्कन्दमाता” बन जाती हैं और फिर संयम व साधना को धारण कर वही स्त्री “कात्यायनी” रूप में हो जाती हैं। अपने दृढ़ संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीतने की सामर्थ्य से वह “कालरात्रि”का रुप धारण करती हैं। इसके उपरांत अपने परिवार को ही अपना संसार मानकर उनका उपकार करने से वह “महागौरी” स्वरूप हो जाती हैं और फिर पृथ्वी छोड़कर स्वर्ग प्रस्थान करने से पूर्व अपनी संतान को समस्त सुख-संपदा का आशीर्वाद देने वाली स्त्री “सिद्धिदात्री” स्वरुपा हो जाती हैं।
नवरात्रि की प्रथम तिथि “प्रतिपदा” में माता के प्रथम स्वरूप “शैलपुत्री” पर्वतराज हिमालय की पुत्री का रूप है। नवरात्रि के प्रथम दिन इनके पूजन से शान्ति प्राप्त होती है। इनका पवित्र मंत्र ” ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्ये नमः” है। इस मंत्र की एक माला का जाप मां दुर्गा जी के चित्र के सम्मुख बैठकर सात्विक भाव व पवित्र चित्त से करना चाहिए।
नवरात्रि की दूसरी तिथि “द्वितीया” को मां का द्वितीय स्वरूप “ब्रह्मचारिणी” है,जो पार्वती जी का तप करता हुआ स्वरूप है। नवरात्र के दूसरे दिन इनकी साधना की जाती है। इनकी साधना से सदाचार, संयम तथा विजय प्राप्त होती है। इनका पवित्र मंत्र ”ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नमः” है। इस मंत्र की एक माला का जाप मां दुर्गा जी के चित्र के सम्मुख बैठकर सात्विक भाव व पवित्र चित्त से करना चाहिए।
नवरात्रि की तीसरी तिथि “तृतीया” को मां का तीसरा स्वरूप “चंद्रघंटा” का होता है। समस्त कष्टों से मुक्ति के लिए इनकी साधना की जाती है। इनका पवित्र मंत्र “ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघंटायै नमः” है। इस मंत्र की एक माला का जाप मां दुर्गा जी के चित्र के सम्मुख बैठकर सात्विक भाव व पवित्र चित्त से करना चाहिए।
नवरात्रि की चौथी तिथि “चतुर्थी” को माता के चतुर्थ रूप “कुष्मांडा” का पूजन अर्चन किया जाता है। इससे आयु,यश व बल में वृद्धि होती है। इनका पवित्र मंत्र ”ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै नमः” है। इस मंत्र की एक माला का जाप मां दुर्गा जी के चित्र के सम्मुख बैठकर सात्विक भाव व पवित्र चित्त से करना चाहिए।
नवरात्रि की पांचवीं तिथि “पंचमी” को मां के पांचवें स्वरूप “स्कंदमाता” क पूजन का विधान हैे । इनके पूजन से सुख, शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है । इनका पवित्र मंत्र ”ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं स्कंदमातायै नमः” है। इस मंत्र की एक माला का जाप मां दुर्गा जी के चित्र के सम्मुख बैठकर सात्विक भाव व पवित्र चित्त से करना चाहिए।
नवरात्रि की छठवीं तिथि “षष्ठी” को मां का छठवां स्वरूप “कात्यायनी” के नाम से जाना जाता है। इनका पूजन अर्चन षष्ठी तिथि को किया जाता है, जिससे रोग, शोक, संताप दूर होकर अर्थ, धर्म, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। इनका पवित्र मंत्र ”ऊँ क्रीं कात्यायनी क्रीं नमः”या “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायने नमः “ है। इस मंत्र की एक माला का जाप मां दुर्गा जी के चित्र के सम्मुख बैठकर सात्विक भाव व पवित्र चित्त से करना चाहिए।
नवरात्रि की सातवीं तिथि “सप्तमी” को मां का सातवां स्वरूप “कालरात्रि” के नाम से जाना जाता है। यह दूसरों के द्वारा किए गए अनिष्ट प्रयोगों को नष्ट करती हैं। इनका पवित्र मंत्र ”ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्यै नमः” है। इस मंत्र की एक माला का जाप मां दुर्गा जी के चित्र के सम्मुख बैठकर सात्विक भाव व पवित्र चित्त से करना चाहिए।
नवरात्रि की आठवीं तिथि “अष्टमी” को मां का आठवां स्वरूप “महागौरी” का होता है जो समस्त कष्टों को दूर कर असंभव कार्य सिद्ध करती हैं। इनका पवित्र मंत्र ”ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं महगौर्ये नमः” है। इस मंत्र की एक माला का जाप मां दुर्गा जी के चित्र के सम्मुख बैठकर सात्विक भाव व पवित्र चित्त से करना चाहिए।
नवरात्रि की नवीं तिथि “नवमी” को मां का नौवां स्वरूप “सिद्धिदात्री” का होता है जिनका पूजन अर्चन नवमी तिथि को किया जाता है। अगम्य को सुगम बनाना इनका कार्य है। इनका पवित्र मंत्र ”ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्र्यै नमः” है। इस मंत्र की एक माला का जाप मां दुर्गा जी के चित्र के सम्मुख बैठकर सात्विक भाव व पवित्र चित्त से कर गौघृत से हवन पूजन कर नवरात्रि पर्व का समापन किया जाता है।
नवरात्रि में नौ दिनों के व्रत और उपवास से जहां शारीरिक व आंतरिक आत्मिक शक्ति प्राप्त होती है, वहीं शरीर के विकारों का नाश हो कर शरीर में नवचेतना का संचार होता है।
कलश स्थापना का सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त (अभिजीत मुहूर्त)दोपहर 11 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 24 मिनट तक रहेगा।


प्रसिद्ध वृद्धम्बिका माता सिद्धपीठ हथियाराम मठ के पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी भवानीनन्दन यति जी महाराज के अनुसार उपासना का मतलब समीप बैठना अर्थात मां के सम्मुख बैठकर ध्यान लगाकर एकाग्र चित्त से अन्तःकरण की शुद्धि करना ही उपासना है। जिस प्रकार दूध में मक्खन है पर दिखता नहीं है। उसे पाने के लिए मेहनत से मंथन करना होता है,उसी प्रकार ईश्वर को पाने के लिए भी अपने भटकते मन पर काबू कर उसे गुरु कृपा से मथना पड़ता है। इसलिए हमें नवरात्रि में व्रत रखकर भक्ति भाव से मां का पूजन अर्चन करना चाहिए। इससे हमें अपनी विकृतियों को त्याग कर सत्कर्मों की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। पूजा पाठ तथा मंत्रों की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि मंत्र में असीमित शक्तियों का भंडार है तो यज्ञ की आहुतियोंं में असीमित ऊर्जा समाहित है। जहां मंत्रों का जाप, पूजन तथा यज्ञ की आहुतियां होती हैं,वहां सकारात्मक शक्तियों का वास और नकारात्मक उर्जा का नाश होता है। शरीर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ने से मन में उत्साह और नई ऊर्जा की वृद्धि तथा नव चेतना का संचार होता है। हवन तथा यज्ञ से जहां सकारात्मक शक्तियों का उदय होता है, वहीं आसपास का वातावरण भी शुद्ध व सात्विक हो जाता है।
नवरात्रि में नौ दिनों के व्रत और पूजन अर्चन से जहां शारीरिक व आंतरिक आत्मिक सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है, वहीं शरीर के विकारों का नाश हो कर शरीर में नवचेतना का संचार होता है।
महाराजश्री ने श्रद्धालु जनों से विश्व कल्याण हेेेतु भक्ति भाव से नवरात्र में मां का पूजन करने की सीख दी।
उल्लेखनीय है कि इस वर्ष नौ दिवसीय शारदीय नवरात्रि का आरम्भ 17 अक्टूबर 2020 से हो रहा है। माताजी का आगमन इस वर्ष 17 अक्टूबर को घोड़े पर हो रहा है और विदायी 25 अक्टूबर को हाथी की सवारी से होगी। आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 24 अक्टूबर को होगी। 24 अक्टूबर को 11.27 बजे के बाद नवमी तिथि हो जायेगी जो 25 अक्टूबर को 11.14 बजे तक रहेगी। नौ दिवसीय व्रतीयों की पारणा दशमी तिथि को 11.14 बजे के बाद की जायेगी। 26 अक्टूबर को ही विजयादशमी का पर्व मनाया जायेगा।

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