इच्छा मृत्यु ! सुप्रीम कोर्ट ने दी सशर्त मंजूरी

नई दिल्ली ,10मार्च 2018।उच्चतम न्यायालय ने कल अपने ऐतिहासिक फैसले में इच्छामृत्यु की अनुमति देते हुए कहा कि ‘सम्मान से मरने का अधिकार’ मौलिक अधिकार है।इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने सशर्त इजाजत दे दी। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाते हुए लोगों को जीवित रहते मौत की वसीयत लिखने की भी इजाजत दे दी। संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा न्यायाधीश ए के सिकरी, ए एम खानविल्कर, डा. डीवाई चन्द्रचूड़ व अशोक भूषण सम्मिलित रहे। न्यायालय में एक याचिका दाखिल कर मरणासन्न व्यक्ति द्वारा इच्छामृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) को मान्यता देने की मांग की गई थी। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने गत 11 अक्तूबर को इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था जो शुक्रवार को सुनाया गया। न्यायालय ने कहा कि लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाना गलत नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि इसके दुरुपयोग से बचने के लिए नियम बनाए जाएं। न्यायालय ने अपने अहम फैसले में कहा कि असाध्य रोग से ग्रस्त व्यक्ति ने उपकरणों के सहारे उसे जीवित नहीं रखने के संबंध में यदि लिखित वसीयत दिया है, तो यह वैध होगा। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वसीयत का पालन कौन करेगा और इस प्रकार की इच्छामृत्यु के लिए मेडिकल बोर्ड किस प्रकार हामी भरेगा, इस संबंध में वह पहले ही दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस संबंध में कानून बनने तक उसकी ओर से जारी दिशा-निर्देश और हिदायत प्रभावी रहेंगे। ‘लिविंग विल’ एक लिखित दस्तावेज होता है जिसमें कोई मरीज पहले से यह निर्देश देता है कि मरणासन्न स्थिति में पहुंचने या रजामंदी नहीं दे पाने की स्थिति में पहुंचने पर उसे किस तरह का इलाज दिया जाए। ज्ञातव्य है कि ‘पैसिव यूथेनेसिया’ य₹(इच्छामृत्यु) वह स्थिति है जब किसी मरणासन्न व्यक्ति को मौत के आगोश में पहुंचाने की मंशा से उसे इलाज देना बंद कर दिया जाता है।


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