भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा से जोड़कर देश की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना आवश्यक 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं भारतीय ज्ञान परंपरा पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न 


गाजीपुर। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन एवं आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में उसके प्रभाव तथा वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में शिक्षा की भूमिका को रेखांकित करने  के उद्देश्य से “राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एवं भारतीय ज्ञान परंपरा” विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी स्नातकोत्तर महाविद्यालय मलिकपूरा में आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के तत्वावधान में गुरुवार 15 अक्टूबर 2026 को सम्पन्न हुई।

          कार्यक्रम में मुख्य अतिथि, महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के कुलपति प्रो. संजीव कुमार रहे। विशिष्ट अतिथियों के रूप में प्रो. हरिकेश सिंह, पूर्व कुलपति, जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा, प्रो. काशीनाथ सिंह पूर्व प्राचार्य राम मनोहर लोहिया स्नातकोत्तर महाविद्यालय एवं प्रो. बद्री सिंह, रक्षा विभाग, स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई।

        संगोष्ठी की संयोजक डॉ. अंजलि यादव ने विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और भारतीय ज्ञान परंपरा का समन्वय विकसित भारत @2047 के संकल्प को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नवाचार को प्रोत्साहित करके राष्ट्र के समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।

    अतिथियों एवं वक्ताओं ने अपने सम्बोधन में कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नैतिक मूल्यों, सामाजिक समावेशन और सांस्कृतिक चेतना का समन्वित विकास आवश्यक है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के बीच सार्थक समन्वय स्थापित करने का अवसर प्रदान करती है। भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित जीवन-मूल्य, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता तथा समग्र विकास की अवधारणा वर्तमान समय में भी प्रासंगिक है। इसके साथ ही वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में तार्किक चिंतन, नवाचार, रचनात्मकता, आत्मनिर्भरता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना भी है। भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन शिक्षा से जोड़कर भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर ज्ञान एवं अनुसंधान के क्षेत्र में देश की भूमिका को सशक्त बनाया जा सकता है।

         संगोष्ठी में शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता करते हुए विषय के विभिन्न आयामों पर विचार-विमर्श किया। शोधपत्रों एवं अकादमिक चर्चाओं के माध्यम से शिक्षा, संस्कृति, भारतीय ज्ञान परंपरा और विकसित भारत के संकल्प के बीच अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला गया। प्रतिभागियों ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा, अनुसंधान और कौशल विकास से जोड़ना समय की आवश्यकता है।

      कार्यक्रम के आयोजन में महाविद्यालय के प्राचार्य/संरक्षक प्रो. (डॉ.) दिवाकर सिंह, मुख्य संरक्षक प्रो. (डॉ.) ज्ञान प्रकाश वर्मा, क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी/प्राधिकृत नियंत्रक, तथा आयोजन समिति के सदस्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। अंत में संगोष्ठी के आयोजन सचिव डॉ. शिव प्रताप यादव ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों, प्रतिभागियों, महाविद्यालय के प्राध्यापकों तथा आयोजन समिति के सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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