तकनीकी माध्यमों से हिन्दी का वैश्विक विस्तार संभव

बलिया। स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बाँसडीह में हिन्दी पखवाड़े के अंतर्गत हिन्दी विभाग की ओर से ‘हिन्दी के वैश्वीकरण में तकनीकी की भूमिका’ विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया।       कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन से हुआ। निक्की तिवारी ने सरस्वती वंदना तथा अंजली और शिवांगी ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। स्वागत वक्तव्य सत्येंद्र कुमार पाण्डेय व विषय प्रवर्तन अंजनी कुमार मिश्र ने किया।


         मुख्य वक्ता डॉ. प्रमोद शंकर पाण्डेय ने हिन्दी के ऐतिहासिक विकास और वैश्विक विस्तार पर प्रकाश डाला। उन्होंने हिन्दी भाषा के प्रथम कवि सरहपा का उल्लेख कर, इसके इतिहास, भौगोलिक विस्तार एवं साहित्यिक विकास पर प्रकाश डालते हुये हिन्दी के वैश्विकीकरण पर विस्तार से चर्चा की, जिसमें गिरमिटिया मजदूरो के द्वारा विदेश में श्रीरामचरितमानस पाठ के माध्यम से अपनी भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण का उल्लेख किया। डॉ. पाण्डेय ने आगे कहा कि हिन्दी, महज एक भाषा ही नहीं है, बल्कि हिन्द देश के निवासियों को हिन्दी कहा जाता है; इसके समर्थन में डॉ० मु० एकबाल का एक मशहूर तराना- “हिन्दी हैं, हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा” का उल्लेख किया। विदेश के राष्ट्रनायको द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से अपना उद्बोधन अपने देश की भाषा में दिये जाने का उल्लेख करते हुये आपने पहली बार भारतीय राष्ट्रनायक पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ की महासभा के मंच से हिन्दी भाषा मे दिये गए उद्बोधन का उल्लेख कर राष्ट्रनायकों के माध्यम से भाषा के वैश्विकीकरण को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक ने हिन्दी के प्रसार की भौगोलिक सीमाओं को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। आज इंटरनेट, सोशल मीडिया, डिजिटल समाचार माध्यम, ब्लॉग, पॉडकास्ट, ऑनलाइन शिक्षा और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म हिन्दी को विश्वभर में पाठकों और श्रोताओं तक पहुंचा रहे हैं। यूनिकोड, मशीन अनुवाद, वाक्-से-पाठ तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों ने हिन्दी के प्रयोग की संभावनाओं को और व्यापक किया है। उन्होंने हिन्दी को वैश्विक स्तर पर सशक्त बनाने के लिए गुणवत्तापूर्ण सामग्री, मानक भाषा के संरक्षण और नई पीढ़ी को डिजिटल माध्यमों से जोड़ने पर जोर दिया। साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग में भाषा की शुद्धता, मौलिकता, विश्वसनीयता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता बनाए रखने की आवश्यकता बताई। इस अवसर पर उपप्राचार्य डॉ. शिल्पी श्रीवास्तव सहित महाविद्यालय के प्राध्यापक, कर्मचारी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन कनीज फातिमा तथा धन्यवाद ज्ञापन प्राचार्य डॉ. फिरोज खान ने किया।

Views: 3


Leave a Reply