मानवता के अभ्युदय के लिए समर्पित है मानव धर्म प्रसार संस्था 

गाज़ीपुर। श्री गंगा आश्रम बयेपुर देवकली द्वारा आयोजित मानव धर्म प्रसार सम्मेलन ग्राम पहितियां के हनुमान मंदिर में सम्पन्न हुआ। 

      बताते चलें कि संत श्री गंगाराम दास जी द्वारा मानवता के अभ्युदय के लिए गाँवों में आयोजित किया जाता है ताकि गाँव के लोग भेदभाव, जातिवाद और मजहबी कट्टरता छोड़कर एक दूसरे के साथ बैठें और सत्य-न्याय-धर्म की स्थापना के लिए साप्ताहिक बैठकों के द्वारा संगठित हों। सभा का आरम्भ धर्म-निरपेक्ष प्रार्थना से हुआ।

        इस विचार-प्रवाह में डॉ माधव कृष्ण ने कहा कि, बढ़कर उत्तरदायित्व लेने का नाम ही मानव धर्म है. इसके लिए किसी को एक सम्प्रदाय विशेष या संत विशेष या परमात्मा के किसी रूप विशेष का अनुयायी होना आवश्यक नहीं है. समाज में लगी आग बुझाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में सहयोग दे सकता है. उन्होंने उदाहरण देते हुए टीवी मैकेनिक रामलाल का नाम लिया जिनका पुत्र दिल्ली में रास्ता पार करते समय दुर्घटना में मर गया था. उन्होंने किसी को दोष देने के स्थान पर तीस वर्षों तक दस घंटे प्रतिदिन उसी स्थान पर ट्रैफिक नियंत्रित करने का कार्य किया जिससे कोई और व्यक्ति दुर्घटना का शिकार न हो। उन्हें न ही किसी प्रकार का पारितोषिक मिलता था और न ही धन, लेकिन उन्होंने कर्त्तव्य-बोध से प्रेरित होकर यह कार्य किया। २०१८ में दिल्ली पोलिस ने उन्हें ट्रैफिक सेंतिनील बनाकर सम्मानित किया, उस समय उनकी आयु ७२ वर्ष थी. उन्होंने महात्मा गांधी, बाबा साहेब अम्बेडकर, दशरथ मांझी के उदाहरणों के माध्यम से लोगों को धर्म का वास्तविक अभिप्राय समझने के लिए अनुरोध किया।

अवधेश मास्टर साहब ने महाभारत काल से द्रौपदी और अश्वत्थामा का प्रकरण उठाकर कहा कि, अपना अहित करने के बाद भी द्रौपदी के मन में अश्वत्थामा के प्रति कोई द्वेष नहीं था। हमें प्रतिशोध से मुक्त रहना चाहिए. श्री रामायण यादव जी ने कहा कि, संसार की एक सेवा यह भी है कि हम किसी व्यक्ति का कुछ न चुराएं और न ही छीनें।

सभा का समापन श्री गुरुदेव की आरती से हुआ, और सभी ग्रामवासियों ने मिलकर एक साथ प्रसाद ग्रहण किया. इस समारोह में श्री गंगा आश्रम के सर्वराहकार भोला बाबा, अजय जी, विरेंद्र जी, नंदलाल जी, तेजबहादुर, रामअवध, सोनू, उपेन्द्र, दीना बाबा इत्यादि उपस्थित थे. गाँव के लोगों से अनुरोध किया गया कि आपसी विवाद को स्थानीय न्याय के माध्यम से सुलझाया जय और इसमें मानव धर्म के स्वयंसेवक सभी कि सहायता कर सकते हैं. अध्यात्म का यही सामाजिक सरोकार है।

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