राष्ट्रीय आंदोलन में जनपद के सब-आल्टर्न वर्ग की योगदान उल्लेखनीय है – प्रो. वी के राय
गाजीपुर कभी पिछड़ा नहीं रहा, ‘सबाल्टर्न’ तबके ने रखी थी आज़ादी की नींव – इतिहासकार डॉ. उबैदुर्रहमान
बिरसा मुंडा पहले सब-आल्टर्न थे- प्रो. केशव मिश्रा
गाजीपुर। उ.प्र. राजकीय अभिलेखागार, संस्कृति-विभाग, लखनऊ एवं स्वामी सहजानन्द पीजी कालेज गाजीपुर के संयुक्त तत्वावधान में “राष्ट्रीय आन्दोलन में गाजीपुर के सब-आल्टर्न वर्ग की भूमिका“ विषयक संगोष्ठी तथा प्रदर्शनी बुधवार 25 मार्च को सम्पन्न हुई।
बताते चलें कि राष्ट्रीय आंदोलन में गाजीपुर के हाशिए पर रहे वर्गों की भूमिका और उनके अप्रतिम योगदान को रेखांकित करने के उद्देश्य से स्वामी सहजानन्द स्नातकोत्तर पीजी कालेज में राष्ट्रीय संगोष्ठी और अभिलेख प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दुर्लभ दस्तावेज भी प्रदर्शित किए गए।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं बीएचयू के पूर्व इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. केशव मिश्रा ने कहा कि इतिहास केवल रटने का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने और परिवर्तन की चेतना जगाने का माध्यम है। उन्होंने बिरसा मुंडा का उदाहरण देते हुए कहा कि अधिकारों की गहरी चेतना ही इतिहास रचती है।
विशिष्ट वक्ता इतिहासकार डॉ. उबैदुर्रहमान सिद्दीकी ने कहा कि गाजीपुर कभी पिछड़ा नहीं रहा, बल्कि यह ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और औद्योगिक दृष्टि से समृद्ध और नेतृत्वकारी जनपद रहा है। उन्होंने बताया कि 1857 की क्रांति में यहां का विद्रोह इतना उग्र था कि खौफ़ज़दा अंग्रेजों ने जिले को तीन हिस्सों में बाँट दिया था। उन्होंने कहा कि आज़ादी की असली नींव उच्च वर्ग ने नहीं, बल्कि नाई, जुलाहे, पासी और कहार जैसे सबाल्टर्न तबकों के गुमनाम नायकों ने रखी थी। गाजीपुर के लगभग 700 गुमनाम सेनानियों ने अंडमान की जेलों में ‘काला पानी’ की सजा काटते हुए अपनी कुर्बानी दी थी।
प्रयागराज से आए सेवानिवृत्त बन्दोबस्त अधिकारी दयानंद सिंह चौहान ने जिले के राजस्व इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 1817 में गाजीपुर एक स्वतंत्र जिले के रूप में अस्तित्व में आया, जिसके पहले कलेक्टर रॉबर्ट बार्लो थे। प्रारंभ में इसका दायरा आजमगढ़ और बलिया तक विस्तृत था।
वसंत कन्या महाविद्यालय, कमच्छा, बीएचयू के डॉ. शशिकेश गौड़ ने ‘उपाश्रयी इतिहास लेखन’ (सबाल्टर्न हिस्टोरियोग्राफी) पर बल देते हुए कहा कि यह विमर्श उन उपेक्षित वर्गों की भूमिका को सामने लाता है जिन्हें इतिहास से बाहर कर दिया गया था।
भभुआ (बिहार) से आए डॉ. अजीत राय ने शेरपुर और मुहम्मदाबाद के जन-आंदोलनों को समझने के लिए मौखिक साक्ष्यों की महत्ता बताई, जबकि क्षेत्रीय अभिलेखागार प्रयागराज के प्राविधिक सहायक राकेश कुमार वर्मा ने अभिलेखों के संरक्षण और उनके महत्व पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. विजय कुमार राय ने सभी अतिथियों का अंगवस्त्र व स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। उन्होंने कहा कि इतिहास के पन्नों में हाशिए पर छूट गए नायकों को सामने लाना हमारी अकादमिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि भी है।
कार्यक्रम की रूपरेखा राजकीय अभिलेखागार के निदेशक अमित कुमार अग्निहोत्री के निर्देशन में तैयार की गई। आयोजन में सह-समन्वयक डॉ. अरविंद यादव, शिवकुमार यादव और अजय कुमार सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा। संचालन संगोष्ठी की समन्वयक डॉ. निवेदिता सिंह ने किया, जबकि अंत में सह-समन्वयक डॉ. राकेश पांडेय ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में प्राध्यापक, शोधार्थी और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
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