धर्म का अर्थ संगठित होकर समाज को आलोकित करना 

वाराणसी। राम जानकी मंदिर लहुराबीर में मानव धर्म व्याख्यानमाला का आयोजन सम्पन्न हुआ। इससे पूर्व गणमान्य लोगों द्वारा प्रातः प्रभात फेरी निकाल कर मानवता के मूलभूत सिद्धांतों सत्य न्याय धर्म और परोपकार के प्रति लोगों को जागरूक किया गया।


          मुख्य वक्ता माधव कृष्ण ने कहा कि, मानव धर्म कोई नया विचार नहीं है और न ही कोई नया सूत्र देता है। यह उन्हीं विचारों को आधुनिक संदर्भों में सामने रखता है जो हजारों वर्षों से समाज को दिशा दे रहे हैं। 

        धर्म हमेशा से सत्य न्याय और परहित की ही बात करता है। सभी के कर्म अलग अलग हो सकते है। किसी के लिए अहिंसा, किसी के लिए पत्नी धर्म, किसी के लिए पुत्री धर्म, किसी के लिए फौजी का हिंसक धर्म, किसी के लिए धनार्जन, किसी के लिए विद्यार्जन, किसी के लिए राजनीति, लेकिन ये सभी कर्म तभी धर्म बनते हैं जब इनमें परसेवा का भाव हो। इसलिए परमहंस बाबा गंगाराम दास कहते है कि परोपकारी धर्मात्मा बिना साधन भजन के भी परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।

        उन्होंने कहा कि, धर्म का अर्थ संगठित होकर समाज को आलोकित करना है। ज्ञान, बल, धन इत्यादि को मुक्त हस्त से बांटना ही धर्म है। मूर्तियों मंदिरों और मस्जिदों कुरआन और पुराणों के धर्म में हम इंसानों का धर्म भूल गए। हम उन लोगों से नहीं जुड़ पा रहे जो हमारे आस पास हैं। जुड़ने की इस कला और संवेदना को ही गंगा बाबा ने धर्म बताया और यही धर्म सारे संसार का मौलिक धर्म है। 

         सभा को भोला बाबा, राजेंद्र मास्टर साहब, इंद्रदेव सिंह ने भी संबोधित कर मानव धर्म अपनाने पर बल दिया। संचाल साहिब जी ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में नागरिक जन उपस्थित रहे।

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