सरस साहित्यिक काव्य-गोष्ठी में कवियों ने बिखेरा जलवा 

ज़हर घुल गया मानो आबो-हवा में, हर आदमी का दम घुट रहा है 


गाजीपुर। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के तत्वावधान में सरस काव्य-गोष्ठी का आयोजन खालिसपुर गांव में संपन्न हुआ।

     गाजीपुर इकाई-प्रमुख एवं सुविख्यात कवि हरिशंकर पाण्डेय के संयोजन में आयोजित काव्यायोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ ग़ज़ल-गो सुदर्शन कुशवाहा ‘चिराग’ ने तथा संचालन डॉ. सन्तोष कुमार तिवारी ने किया। आगंतुक कविगण एवं अतिथियों का स्वागत हरिशंकर पाण्डेय ने किया। 

        वरिष्ठ साहित्यकार स्मृतिशेष गंगाधर पाण्डेय ‘सुमन’ की पुण्य-स्मृति को नमन कर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। भजन-गायक अभिमन्यु यादव ने “सोचो मानव जग के सुख का विस्तार रहेगा कितने दिन, ये प्यार रहेगा कितने दिन, के माध्यम से जीवन की क्षणभंगुरता और मानवीय मूल्यों की स्थायित्व-चिन्ता को अभिव्यक्त किया।

       गोपाल गौरव ने अपनी ग़ज़ल “उनसे जब से मेरी दोस्ती हो गई, ज़िन्दगी में मेरी रौशनी हो गई तो हरिशंकर पाण्डेय ने “कहाँ गइल दादी अउरी नानी के कहानी, एगो रहलें राजा अउर एगो रहली रानी। मरल जाता आज सबके ॲंखियन क पानी।” सुनाकर वाहवाही बटोरी। वरिष्ठ गीतकार गौरीशंकर पाण्डेय ‘सरस’ ने “ज़हर घुल गया मानो आबो-हवा में, हर आदमी का दम घुट रहा है।” द्वारा समसामयिक विडंबनाओं को चित्रित किया तथा “धनिया कहना ला मानी, अबकी दाईं लड़ा परधानी।” से लोक-जीवन की सहजता का रंग बिखेरा। वहीं डॉ. अक्षय पाण्डेय ने “शब्दों के तुम अर्थ बचाना, अर्थों की महिमा। बेच रहे मंचों के नायक, कविता की गरिमा। सुनाकर साहित्यिक मूल्यों की रक्षा का संदेश दिया। कवि मनोज यादव ‘बेफिक्र’ ने “ख़ुद तो सुधरें, उन्हें सुधारें जो पीढ़ी आने वाली है। खुशियों की वह बगिया होगी, जिनके हम सब बनमाली है, तो डॉ. सन्तोष कुमार तिवारी ने “मैं रोज़ देखता हूँ एक सपना, द्वारा मानवीय चेतना को सशक्त अभिव्यक्ति दी। कवियित्री प्रीतम कुशवाहा की पंक्तियाँ “तुम्हारी नज़रों ने मिलके मुझसे नज़र को पढ़ना सिखा दिया है। क्या राज़ दिल में छुपा है उनके, ये राज़ दिल का बता दिया है।” ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। उमाशंकर यादव ‘पथिक’ ने “गीत लिखता रहा ज़िन्दगी के लिए, ग़म भी पीता रहा बंदगी के लिए।” से जीवन-संघर्ष को वर्णित किया। महाकवि कामेश्वर द्विवेदी ने “नारियाँ हैं भूल गईं अपना सुसंस्कार, उड़ी जा रही हैं आज लाज-भय छोड़के। राम कृष्ण सीता राधा की पवित्र धरती को, कौन श्राप लगा मन दुखी यही सोच के।” द्वारा नैतिक अवनति का उल्लेख किया और रामदेव पाण्डेय ने “आपन सुख लुटावत बानी, दिन भर रहींला सरेह में। तिकवत रहीं हरदम खेत में सुनाकर ग्रामीण जीवन की श्रम-संवेदना को प्रस्तुत किया। कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन कर वाहवाही लूटी। 

        अध्यक्षीय काव्यपाठ में सुदर्शन कुशवाहा ‘चिराग’ ने “ग़म के साये में हँस कर गुज़ारा करो, हाथ अपना न हरगिज़ पसारा करो।” प्रस्तुत कर जीवन-संघर्ष में धैर्य, आत्मबल और सन्तुलन का संदेश दिया।  

          इस अवसर पर सतीश सिंह, राजेन्द्र पाण्डेय, नन्दकिशोर सिंह, रविशंकर पाण्डेय, शशिकान्त पाण्डेय, लल्लन पाण्डेय, रविशंकर गुप्त, ब्रजेश यादव सहित काफी संख्या में गणमान्य जन उपस्थित रहे। आभार ज्ञापन राजनारायण पाण्डेय ने किया।

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