लोकमंगल ही साहित्य की एकमात्र जाति और धर्म
गाजीपुर। उन्मेष परिवार और उपनिषद मिशन द्वारा आयोजित “साहित्य की जाति और धर्म” विषयक साहित्यिक संगोष्ठी में वक्ताओं तथा कवियों ने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया। शहर के अष्टभुजी कॉलोनी के द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल में गोष्ठी का शुभारंभ प्रारंभ संजय पांडेय के गीत “वीणावादिनी ज्ञान की देवी तू ज्ञान की ज्योति जगा देना” के साथ हुआ। कार्यक्रम में युवा कवि मनोज कुमार के पहले काव्य संग्रह “जिनके हम सब माली हैं” का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम के अध्यक्ष कवि कामेश्वर द्विवेदी ने पढ़ा “उगता नित्य मनुज के अन्तर में अंकुर कटुता का/पथ के शूल हटाकर पग-पग फूल बिछाना होगा। वहीं रामनिवास सिंह ने कहा कि जाति और धर्म कभी उत्कृष्ट साहित्य पर हावी नहीं रहते। उन्होंने रसखान, तुलसीदास, प्रेमचंद का उदाहरण देते हुए कहा कि साहित्य ने जाति और धर्म की रुढियों पर प्रहार ही किया, उसका समर्थन नहीं किया। शोधार्थी कृष्णानंद मिश्रा ने कहा कि स्वार्थपरक लेखन साहित्य नहीं है। प्रो. समरेंद्र नारायण मिश्र ने कहा कि साहित्य की केवल एक जाति और धर्म है और वह है लोकमंगल। मुख्य वक्ता डॉ निरंजन यादव ने कहा कि भोगा हुआ यथार्थ साहित्य के विषय हो सकते हैं। बदलते समय के साथ साहित्य के प्रतिमान बदलते हैं। रामनगीना कुशवाहा ने बिना किसी मोह के जाति और धर्म की संकीर्णताओं को भूल जाने की वकालत की। माधव कृष्ण ने कहा कि, इस देश में दो विचारधाराओं पर जाति और धर्म को समाप्त करने की महती जिम्मेदारी थी, वामपंथ और अध्यात्म। लेकिन दोनों के साहित्य जमीन पर आते ही वर्ग संघर्ष और जातीय भेदभाव को जन्म देते गए। वही लिखें, पढ़ें और बोलें जिससे सबका हित हो, न कि समाज में घृणा फैले। युवा कवि रमाकांत राही ने “,इस नफरत के अंगार में भी श्रंगार ही लिखते जाएंगे/हम दीवाने हैं दीवानों के प्यार ही लिखते जाएंगे” सुनाकर तो रश्मि शाक्य ने “हमने जिसे मोती दिए सागर खंगालकर/ दामन हमारा रख दिया वही ज़वाल कर और पूजा राय ने “तुम रो लेना धर्म जाति जमीन के लिए/मैं रो लूंगी धरती पानी और तितली के टूटे हुए पंख के लिए” सुनाकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। वरिष्ठ कवि हरिशंकर पांडेय ने गीत गाकर लोगों को सोचने पर विवश कर दिया कि “आवते पतोहिया/चली गइली विदेशवा / कन्हियों न दीहें ऊ त/अंतिम समईया राम।” तो रामअवध कुशवाहा ने अपनी व्यंग्यात्मक कविता “मुझे माफ़ करना ओ चमचे! ओ प्याले!” पढ़ी। मनोज कुमार ने अपनी कविता “बच्चा अब बड़ा हो गया है”, सुनाकर सभी से परिपक्वता की आशा की। वीर रस के कवि दिनेश चंद्र शर्मा ने पढ़ा, “आपस के मसले बाद में देख लेंगे/पहले डूबती कश्ती को संभालो यारों।” इस अवसर पर डॉ सुभाष यादव, डॉ शिव यदुवंशी, बृजेंद्र यादव, अनिल राय इत्यादि उपस्थित रहे।
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