सन्त के आचरण को ग्रहण करने से होगा कल्याण

भव्य भंडारे के साथ हुआ चातुर्मास महानुष्ठान का समापन


 धर्म की रक्षा हेतु शस्त्र उठाना भी शास्त्र सम्मत

गाजीपुर। प्रसिद्धपीठ हथियाराम मठ के 26वें पीठाधिपति एवं जूना अखाड़ा के वरिष्ठ महामंडलेश्वर स्वामी श्री भवानीनन्दन यति जी महाराज द्वारा किए जा रहे चातुर्मास महानुष्ठान का समापन भाद्र पद पूर्णिमा 18 सितंबर बुधवार को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हवन पूजन के साथ सम्पन्न हुआ।

उल्लेखनीय है कि अध्यात्म जगत में एक तीर्थ स्थल के रूप में विख्यात करीब 900 वर्ष प्राचीन सिद्धपीठ हथियाराम मठ के 26वें पीठाधीश्वर स्वामी भवानी नन्दन यति महाराज ने गुरुजनों का अनुसरण करते हुए चातुर्मास अनुष्ठान का संकल्प लिया था। इसी क्रम में उन्होंने देश के 12 ज्योतिर्लिंगों सहित नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में अपना चातुर्मास महानुष्ठान संपादित करते हुए कुछ वर्षों से सिद्धपीठ हथियाराम मठ से ही चातुर्मास अनुष्ठान संपादित कर रहे हैं।  इस कड़ी में चातुर्मास महानुष्ठान की पूर्णाहुति पर प्रमुख यजमान शिवानन्द सिंह झुन्ना और महामंडलेश्वर के साथ ही अन्य गणमान्यजनों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हवन पूजन किया।                                                इसके उपरान्त शुरू समापन समारोह में महामंडलेश्वर स्वामी भवानीनंदन यति ने अपने ब्रह्मलीन गुरु महामंडलेश्वर स्वामी बालकृष्ण यति महाराज के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलित व माल्यार्पण किया। समापन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि बीएचयू के पूर्व कुलपति एवं उ प्र. उच्च शिक्षा के अध्यक्ष प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना से कार्य करने का आह्वान किया ताकि भारत एक बार फिर विश्वगुरु बन सके। उन्होंने गुरु महाराज और सिद्धपीठ की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि गुरु ही वह शक्ति है जो हमें आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। सिद्धपीठ की धरती अत्यंत ही पावन और वंदनीय है, जहां की अधिष्ठात्री देवी मां के दर्शन पूजन से समस्त कष्टों का निवारण होता है। अपने विशेष अन्दाज में धर्म, संस्कार, आचार, विचार की व्याख्या करते हुए भारत के बसुधैव कुटुम्बकम् को मानवीय दृष्टिकोण से सर्वश्रेष्ठ बताया। उन्होंने कहा कि समाज का जितना नुकसान दुष्टों की दुष्टता से नहीं हुआ है उससे अधिक नुकसान सज्जनों के मौन धारण या चुप्पी से हुआ है। महाभारत के द्रोपदी चीर हरण के प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि यदि वहां पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे धर्म धुरंधर  दुर्योधन के बातों का विरोध कर उसे रोक सकते थे परंतु इन महारथियों ने धर्म का रास्ता छोड़ दिया और राज्य के उत्तरदायित्व से बंधे रहे जिसका अंत महाभारत युद्ध के रूप में हुआ। रामचरितमानस का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि सीता हरण के दौरान जटायु यह जानते हुए भी कि वह रावण से जीत नहीं सकता फिर भी एक नारी की रक्षा के लिए उसने अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की। यही कारण था कि उसे मरने से पूर्व प्रभु की गोद में रहने का अवसर मिला जबकि धर्म का साथ न देने के कारण भीष्म को शरशैय्या पर कष्ट झेलना पड़ा। उन्होंने कहा कि महाराज श्री ने सज्जन शक्ति के जागरण का कार्य शुरु किया है। कहा कि भारत अधिकार प्रधान नहीं कर्तव्य प्रधान देश रहा है। कर्तव्यों का बोध हो तो अधिकार की चिंता करने की जरूरत नहीं। कर्तव्य बोध पर आधारित समाज खड़ा करना होगा। महिलाओं की महत्ता बताते हुए कहा कि जब कोई पुरुष दुविधा में पड़ता है तो महिला ही उसे दुविधा से निकालने का काम करती है। देश को महान बनाना है तो महिलाओं को आगे आना होगा।

       पीठाधीश्वर स्वामी भवानी नन्दन यति ने आशीर्वचन देते हुए चातुर्मास अनुष्ठान की महत्ता और सनातन संस्कृति को दृष्टिगत रखते हुए धर्म संस्कृति से जुड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सभी धर्मों से बढ़कर मानवता का धर्म है, जिसका पालन करें। कहा कि शरीर में आत्मा तो मंदिर में परमात्मा के रूप में जाने जाते हैं। बताया कि समय के साथ चलना सर्वोत्तम है। संत कभी मरता नहीं है, संत तो ब्रह्मलीन होते हैं। जरूरत पड़ने पर मैं शास्त्र के साथ-साथ शस्त्र लेकर सीमा पर जाने को भी तैयार हूं। यह सिद्धपीठ सिद्ध संतों की तपस्थली है, जहां मां के दरबार में सच्चे मन से सिर झुकाने के बाद किसी को दुनिया में किसी और के सामने सिर झुकाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 

        समारोह में मंचासीन अतिथियों, पत्र प्रतिनिधियों एवं अन्य विशिष्टजनों को अंगवस्त्रम आदि देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर आचार्य शंभूनाथ पाठक, मानस मर्मज्ञ डा. मंगला सिंह, सोमनाथ सिंह, देवरहा बाबा बिरनो, रजनीश राय, स्वामी सत्यानंद यति, आचार्य पंडित मनीष कुमार पांडेय, वरुणदेव सिह, प्रवेश पटेल, डॉ. रत्नाकर त्रिपाठी, संतोष यादव, अमिता दूबे, डॉ संतोष मिश्रा, डॉ सर्वानंद सिंह, मंजू सिंह, सविता सिंह, सुरेन्द्र सिंह, रमेश सिंह पप्पू, अरविंद कुमार सहित तमाम शिक्षाविद, संत और गणमान्यजन उपस्थित रहे। अंत में पुण्य लाभ की कामना संग लोगों ने भंडारा से महाप्रसाद ग्रहण किया।

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