श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष – डा. ए.के. राय
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष – डा ए के राय
गाज़ीपुर । श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रुप में मनाया जाता है। योगेश्वर कृष्ण के भगवद्गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। हिंदू धर्म में कृष्ण जन्माष्टमी महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है। इसे लड्डू गोपाल के भक्त भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं। भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। इस खास मौके पर मंदिरों को तरीके से सजाया जाता है और शुभ मुहूर्त पर बल रुप श्रीकृष्ण की विधि-विधान पूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। भक्त इस दिन दिन भर व्रत रखते हैं और उनकी भक्ति में लीन होकर पूजा-पाठ करते हैं। श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में मथुरा में कंस के कारागार में हुआ था। ब्रह्मपुराण के अनुसार द्वापर युग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रात्रि में रोहिणी नक्षत्र में वासुदेव की पत्नी देवकी के अष्टम पुत्र के रुप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। तब चंद्रमा वृष राशि में मौजूद थे। उस समय मथुरा के महाराज कंस के निरंकुश शासन से प्रजा में त्राहिमाम मचा हुआ था ऐसी मान्यता है कि कंस के संहार के लिए भगवान विष्णु ने द्वापर युग में श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया था। उन्होंने मथुरा की पीड़ित जनता को कंस के अत्याचारों से मुक्ति दिलाकर कंस के पिता महाराज उग्रसेन को राजगद्दी सौंपी और धर्म की स्थापना के लिए आजीवन लगे रहे। कौरव और पांडव के बीच चले महाभारत युद्ध के दौरान उनके द्वारा रणक्षेत्र में पांडव पुत्र अर्जुन को दिया गया गीता का उपदेश आज भी प्रासंगिक है। आज भी गीता संस्कारित जीवन का संपूर्ण सार माना जाता है। यही कारण है कि आज भी श्री कृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। वर्तमान समय में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर पूरा देश कृष्णमय हो जाता है। बाल कृष्ण की अलौकिक झांकियों से देव मंदिरों को सजाया जाता है। जन्माष्टमी के दिन, श्री कृष्ण पूजा निशीथ समय पर की जाती है। वैदिक समय गणना के अनुसार निशीथ मध्यरात्रि का समय होता है। निशीथ काल में ही भक्तों द्वारा अर्धरात्रि में श्री बालकृष्ण का जन्मोत्सव पूरे विधि-विधान से पूजन अर्चन कर मनाया जाता है। जन्मोत्सव पर श्रीकृष्ण को फल,फूल पंचामृत, मेवा, माखन, मिश्री के साथ ही साथ धनिया के पंजीरी का भोग आवश्यक माना जाता है। चिकित्सकीय मान्यता है कि बर्षा ऋतु में शरीर में वात व कफ की अधिकता हो जाती है जिसमें शमन के लिए धनियां व मीठा उसका प्राकृतिक उपचार हे क्योंकि यह बगैर किसी नुकसान के शरीर को सामान्य तौर पर ठीक रखने में मददगार होता है। जन्माष्टमी के दिन व्रती स्नान कर साफ कपड़े पहन सात्विक भाव से व्रत रखें। संध्या समय भगवान श्री कृष्ण को दूध और गंगाजल से स्नान कराएं और साफ रेशमी वस्त्र धारण कराकर बाल गोपाल को झूला पर आसीन करें। रात में जन्म होने पर शुभ समय में माखन,मिश्री, फल, खीरा पंजीरी तथा पंचामृत का भोग लगाकर पूजन और आरती करें। इस वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी काफी ज्यादा शुभ मानी जा रही है। इस वर्ष जन्माष्टमी की तिथि को लेकर श्रद्धालुओं में काफी असमंजस है क्योंकि इस वर्ष जन्माष्टमी का त्योहार दो तिथियों में यानी 26 अगस्त और 27 अगस्त को दोनों ही दिन मनाया जा रहा है। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 26 अगस्त को दिन में आठ बजकर बीस मिनट से लग रही है। रोहिणी नक्षत्र रात को 8:23 से लग जाने से रात्रि में जयंती योग में श्री कृष्ण जन्माष्टमी मनायी जाएगी। 27 अगस्त को उदया अष्टमी को वैष्णव जनों की श्री कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी।
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