भुड़कुड़ा मठ के दसवें महंत रामाश्रय दास जी महाराज की मनी पुण्यतिथि 

गाजीपुर। आध्यात्मिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से विख्यात सिद्धपीठ भुड़कुड़ा मठ के दसवें महंत रामाश्रय दास जी महाराज की पुण्यतिथि मंगलवार को शिष्य श्रद्धालुओं द्वारा मनाई गयी‌। इस अवसर पर श्रद्धालु जनों ने उनकी समाधि पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर श्रद्धांजलि अर्पित किया। 

          कार्यक्रम में शामिल वक्ताओं ने उन्हें सामाजिक समरसता का अग्रदूत बताया‌। कहा गया कि वह छु़आछूत व ऊंच-नीच से परे रहे। हमें उनके बताए रास्ते पर चलने की जरूरत है। 

     मठ के बारे में चर्चा करते हुए कहा गया कि सत्रहवीं शताब्दी में भुड़कुड़ा वनों से आच्छादित एक छोटा सा गांव हुआ करता था। जहां लगभग सन 1687 के आसपास गुरु और शिष्य का आविर्भाव एक साथ हुआ। कालांतर में बूला, गुलाल और भीखा साहब की इस परंपरा के क्रम में दसवां नाम महंथ रामाश्रय दास का रहा। वर्ष  1919 में जन्मे रामाश्रय दास पदार्पण पन्द्रह वर्ष की आयु में इस क्षेत्र में हुआ। बुजुर्गों के अनुसार घर से नाराज होकर बालक रामाश्रय रेल मार्ग से काशी जा रहे थे। भूख प्यास से व्याकुल होकर जखनियां स्टेशन पर उतर गए और फिर घुमते फिरते भुड़कुड़ा के मठ तक आ पहुंचे।ग मठ के तत्कालीन महंथ रामबरन दास जी ने उन्हें मठ परिसर में आश्रय दिया और बाद में शिष्यत्व भी प्रदान किया। वर्ष 1969 में उनके समाधिस्थ होने के बाद रामाश्रय दास इस साधना केंद्र रूपी तीर्थस्थल के पीठाधिपति बने। उन्होंने सन 1972 में अपने गुरु के द्वारा आरंभ किए कार्य को आगे बढ़ाते हुए भुड़कुड़ा महाविद्यालय की स्थापना कर ग्रामीणांचल के अभावग्रस्त छात्रों हेतु उच्च शिक्षा का द्वार खोला। बाद में वही महाविद्यालय श्री महंत रामाश्रय दास पीजी कालेज के रूप में विख्यात हुआ। महाविद्यालय की स्थापना के पीछे उनके मन में धन या यश की कामना नहीं बल्कि समता, स्वतंत्रता और बन्धु भाव के मूल्य पर आधारित समाज की आधारशिला तैयार करना था।                                  

        रामाश्रय दास जी एक सिद्ध सन्त थे। उनका व्यवहार प्रशंसा और निंदा से प्रभावित नहीं था। वह संगीत के साथ मानस तथा सनातन साहित्य के मनन चिंतन में गहरी रुचि रखते थे। श्रीरामचरितमानस में नवधा भक्ति का प्रसंग आता है जिसमें नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन सन्त कवि तुलसीदास जी ने किया है। एक साधक के रूप में रामाश्रय दास जी ने मठ की परंपराओं का निर्वहन करते हुए नवधा भक्ति को साध लिया था। वे सत्संग और भगवत चिंतन में रत निरभिमानी मुखमण्डल, निष्कपट हृदय, इंद्रिय निग्रह, समता, सरलता जैसे गुणों से परिपूर्ण लोभरहित व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके मुखमण्डल पर निश्छल हँसी मौजूद रहती थी,  बातचीत के दौरान प्रसन्न होने पर ताली बजाकर ठहाका लगाते थे। उनका साधारण रहन सहन उनके भीतर बैठी असाधारण आत्मा से जनसामान्य का परिचय और मेलजोल कराता था। अपनी सन्तीय परम्परा का पालन करते हुए 

महंत रामाश्रय दास जी 14 मई 2008 को ब्रह्मलीन हुए थे।

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