गुलाब राय सर्जना पुरस्कार से पुरस्कृत पुस्तक “वेद और हमारा जीवन” का हुआ लोकार्पण

गाजीपुर। प्रख्यात कथाकार रामावतार जी की उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा गुलाब राय सर्जना पुरस्कार से पुरस्कृत पुस्तक “वेद और हमारा जीवन” का लोकार्पण, शहर के डीएवी इंटर कॉलेज के सभागार में ससमारोह सम्पन्न हुआ।
बीज वक्तव्य में दार्शनिक व्याख्या करते हुए माधव कृष्ण ने कहा कि, यह पुस्तक रामावतार जी के वैचारिक विकास का उदाहरण है। वेदों के ग्यारह मन्त्रों की व्याख्या को सरल, प्रांजल और कथामय भाषा में प्रस्तुत किया गया है. उन्होंने अमर्त्य सेन के “आर्गुमेंटेटिव इंडियन ” की भूमिका और प्रथम अध्याय का संदर्भ देते हुए कहा कि वैदिक सूत्रों से भारत में प्रजातंत्र के मजबूत होने में सहायता मिली क्योंकि यह विमर्श और सम्वाद की संस्कृति है। वेदों के भाष्यकार श्रीकृष्ण ने लिखा है कि एकमात्र वेदवादरत लोगों की सही दिशा में प्रगति नहीं होती, यदि उसके आचरण में इसके सूत्र नहीं उतरते। उन्होंने विश्व प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक तिक न्यात हन्ह की पुस्तक के आधार पर इस भ्रम को भी दूर किया कि बुद्ध का वेदों से विरोध है।
भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त प्रबंधक महेश चन्द्र लाल ने कहा कि भगवातंत्र और हरातंत्र स्वस्थ विमर्श को प्रभावित कर रहे हैं। इंटर कॉलेज की प्रवक्ता डॉ रिचा राय ने कहा कि जीवनोपयोगी वेद मन्त्रों को लेकर लेखक ने व्यापक जीवन-दर्शन प्रस्तुत किया है; जैसे एक प्रसंग में महान उपन्यासकार जैनेन्द्र कुमार द्वारा सदा किराए के मकान में रहने के द्वारा जीवात्मा और शरीर में अंतर स्पष्ट किया गया है।
सेवानिवृत्त प्रवक्ता डॉ रामबदन सिंह ने कहा कि, कुछ वेदमंत्रों की सरल व्याख्या की आवश्यकता इस पुस्तक से पूरी होती है। यह कोरोना काल के एकाकी मनन-चिन्तन का परिणाम है और प्रकारांतर से वेदों का नीति-एकादश और सैद्धांतिक सुभाषित है।
कार्यक्रम के सूत्रधार और प्रसिद्ध एकांकीकार गजाधर शर्मा गंगेश ने कहा कि, वेद हमारी व्यक्तिगत-समाजिक-वैश्विक वेदनाओं का दमन करने वाला ग्रन्थ है। लेखक लोकार्पण को लेकर संकोची हैं लेकिन लोकार्पण से समाज में पुस्तक और सम्बद्ध विचारों का प्रचार होता है। उन्होंने पुस्तक के स्वास्थ्य सूत्रों को उद्धृत करते हुए मानव जीवन में इन मन्त्रों के व्यावहारिकता को रेखांकित किया।
प्रख्यात कथाकार और कृष्णायण के प्रसिद्ध रचयिता डॉ रामबदन राय ने कहा कि, उदारता और सहिष्णुता वैदिक मतावलंबियों की सद्गुणी कमी है जिसके कारण भारत वेदों से दूर हो गया। ‘नेति’ शब्द को स्वीकार कर लेने से सभी विवादों पर विराम लग जाता है। मुख्य वक्ता डॉ श्रीकांत पाण्डेय जी ने कहा कि, लेखक की सालों की साधना को अंततः सत्ता प्रतिष्ठान से सम्मानित किया. लेखक ने अपने विवेक का प्रयोग किया और वेदों के ग्यारह महत्वपूर्ण मन्त्रों का सम्पादन किया। लेखक आस्तिक है और लेखों के माध्यम से ईश्वरत्व को स्थापित करता है। वेद हिन्दुओं का प्राचीनतम ग्रन्थ है और अस्तित्वबोध से निकली है।
आर्य समाज के प्रमुख आदित्य प्रकाश जी ने वेदों के त्रैधवाद पर प्रकाश डाला और सभी को सत्य के लिए निर्भीक रहने पर बल दिया. सभा के अध्यक्ष भूतपूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ युधिष्ठिर तिवारी ने कहा कि, वेद कम पढ़े-लिखे लोगों से डरता है क्योंकि कम पढ़े-लिखे लोग वेद को आहत करते हैं. लेखक अपने अनुभवों को साझा करते हुए वेद के मन्त्र से उसकी पुष्टि करते हैं और इस प्रकार इस पुस्तक की रचना हुई. इस पुस्तक से उन्होंने कृपणता का अर्थ संकीर्णता से किया और आधुनिक परिवेश में उदारता की आवश्यकता को वेदों का वाक्य और पूंजीवाद पर प्रहार बताया।
आर्य समाज द्वारा माल्यार्पण कर लेखक का स्वागत किया गया. पुस्तक के लेखक रामावतार ने भी अपना उद्गार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन हिन्दी प्रवक्ता डॉ संतोष कुमार तिवारी ने किया। डी ए वी इंटर कॉलेज के छात्रों ने सरस्वती वंदना की। धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम की अध्यक्षता कॉलेज के प्रधानाचार्य हरिशंकर शर्मा ने किया। कार्यक्रम में विश्वविमोहन शर्मा, प्रमोद राय, जनार्दन शर्मा, रामावतार शर्मा, अंगद शर्मा, गंगा सागर शर्मा, अमेरिका यादव, देवेंद्र शर्मा आदि ने प्रमुखता से सहभागिता की।


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