कवि हौशिला अन्वेषी की रचना

सीधे तीर चलाना सीखो ।
अपना देश बचाना सीखो ।
कौन यहाँ गड़बड़ करता है।
जल्दी उसे हटाना सीखो ।।


कहाँ फँसा है देश हमारा।
इसका पता लगाना सीखो ।
घर में बैठे सोच रहे हो।
घर से बाहर आना सीखो ।

कुछ बंधन हैं, कुछ रुकावटें ।
क्रमशः उन्हें हटाना सीखो ।
कितने अब अंग्रेज बचे हैं।
उनको मार भागना सीखो ।।

अपने प्यारे लोकतंत्र को ।
मजबूती में लाना सीखो ।।
अपने घर में लूट मची है।
इसपर रोक लगाना सीखो ।

और समानता के दर्शन को।
भारत में फैलाना सीखो ।।
नैतिकता के गिरे ग्राफ को।
ऊपर जरा उठाना सीखो ।।

खुद ही हम बाजार बनेंगे ।
खाना और खिलाना सीखो ।।
कंगूरे पर जो बैठे हैं ।
उन्हें जमीन पर लाना सीखो ।।

जहाँ जरूरत रुदन कर रही।
वहाँ रसद पहुँचाना सीखो ।।
भाईचारा के विचार को ।
जीवन में अपनाना सीखो ।।

अपना ऊँचा रहे तिरंगा ।
वही गान बस गाना सीखो ।।
मानवता के लिए समर्पित ।
सारा प्रेम लुटाना सीखो ।।

परोपकार का भाव जगा कर ।
जीवन सफल बनाना सीखो ।।
सोए हो तुम कहाँ मुसाफिर ।
खुद को आज जगाना सीखो ।।

……… अन्वेषी

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