कविता ! “उठ दीप जला”

“उठ दीप जला”


उठ दीप जला तम दूर भगा, भर दे जग में तू उजियारा।
कुछ कर ऐसा आगे बढ़ के, फिर रहे कहीं न अंधियारा।।
भय ग्रस्त जो चेहरे दिखते हैं,खुशियाँ उन चेहरों पर ला दे।
जो व्याप्त हुआ है भय उर में,कर दूर उसे खुशियाँ भर दे।।
माना दीपक के जलने से, कुछ कीट पतंगे आएंगे ।
लेकिन उसकी लौ से टकरा, बेमौत वहीं मर जाएंगे।।

जब दीप जलेगा घर-घर में,आशा फैलेगी इस जग में।
जो हिम्मत हार चुके जग में,भर दे साहस उन के मन में।।
जरा कदम बढा के देख तो तूं,क्यों आहत है ये मानवता?
आकाश फतह करने वाला ,क्यों आज दिखाता कायरता?
है तुझे वास्ता सृष्टी का, न कदम खींच पीछे डर से।
आगे बढ मन का दीप जला, तम भागेगा हर एक मन से।।

उठ दीप जला तम दूर भगा, भर दे जग में तू उजियारा।
कुछ कर ऐसा आगे बढ़़ के, फिर रहे कहीं न अंधियारा।।
कवि- अशोक राय वत्स
रैनी, मऊ,उत्तरप्रदेश
मो.8619668341

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