नवीन कृति – विनती मेरी स्वीकार करो

“विनती मेरी स्वीकार करो”


आ गया वसंत देखो चहुँ ओर
वृक्षों ने ली अंगड़ाई है।
पाकर रस धरा का देखो
कैसी हरियाली छाई है।

माँ शारदे का श्रृंगार कर
मैने वर माँग लिया देखो।
हर घर में फैले उजियारा
मैने यह ठान लिया देखो।

माँ से की है विनती मैने
तम नाश करो तुम इस जग से।
शिक्षा पहुँचे हर जन जन तक,
उपकार करो बस तुम इतना।

आया हूँ आज शरण में माँ,
विनती मेरी स्वीकार करो।
हर मन खुशियों से भर जाए
बस इतना तुम उपकार करो।

माँ आया हूँ मैं आज शरण
विनती मेरी स्वीकार करो।
विनती मेरी स्वीकार करो।।

कवि – अशोक राय वत्स
रैनी, मऊ (उत्तरप्रदेश) मो. 8619668341

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