उपेक्षा ! साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर बेदम जलालाबादी

गाजीपुर (उत्तर प्रदेश),18 मार्च 2018।सांस्कृतिक विरासत संजोए, गंगा जमुनी तहजीब की पोषक गाजीपुर की एतिहासिक धरती सदैव से वीरों, महापुरुषों, ऋषि मुनियों, ज्ञानियों, साहित्यकारों तथा रणबांकुरों की जननी रही है। सादगी, संजीदगी और स्वाभिमान से लवरेज अनेकों महानुभावों ने अपने कर्मों से जिले का नाम रौशन किया है। ऐसे ही व्यक्तित्व के सशक्त हस्ताक्षर हैं – मोहम्मद सईद अंसारी उर्फ बेदम जलालाबादी।


जिले के जखनियां तहसील क्षेत्र के जलालाबाद निवासी मोहम्मद सईद अंसारी उर्फ बेदम जलालाबादी ने अपनी रचनाओं से उच्च मुकाम हासिल किया है। आजाद हिंदुस्तान के अभ्युदय काल सन 1947 में जन्मे बेदम साहब जलालाबाद स्थित ननिहाल में रहकर मदरसे और गृह शिक्षा के आधार पर तालीम हासिल की। वे अपना उस्ताद नूरुद्दीन उर्फ यतीम आजमी को मानते हैं जिससे गीत रचना की हुनर सीखा था। उभरती प्रतिभाओं को तवज्जो देने के साथ-साथ ऊंचे मुकाम तक पहुंचाने वाले मोहम्मद सईद अंसारी उर्फ बेदम जलालाबादी साहब का नाम हिंदुस्तान के मशहूर शायरों में गिना जाता है। गीतों की विभिन्न विधाओं यथा – कव्वाली, ग़ज़ल, खमसा, मुसद्दस, शहादत, नात शरीफ, मुजाहिदाना आदि में उनकी रचनाएं उनकी काबिलियत को दर्शातीे हैं। बेदम साहब द्वारा लिखी गीतों को हिंदुस्तान के मशहूर कव्वाल और कव्वाला आज भी बड़े शौक से गाते हैं।हिंदुस्तान की नामचीन कैसेट्स कंपनियों जैसे टी सीरीज ,भारत, चंदा, सोनी ,नमाज़ ए हक के लिए गीत लिखकर अपनी कलम की काबिलियत का एहसास कराने वाले बेदम जलालाबादी साहब की गीतों को सफी परवाज, यूनिस हलचल, इकबाल वारसी, युसूफ आजाद ,तस्लीम आरिफ,टीना परवीन, बच्चा एक लाख, मुन्नन बानो ,बेबी डिस्को, अशोक जख्मी जैसे हिंदुस्तान के ढेरों प्रसिद्ध कव्वाली गाने वालों ने अपनी आवाज देकर बुलन्दियों तक पहुचाया है। टी सीरीज के आग्रह पर लिखी गई गीत “जटाधारी बनके त्रिपुरारी बनके चले आना—-” को तो तृप्ति शाक्या के अलावा फिल्म जगत की मशहूर पार्श्वगायिका अनुराधा पौडवाल जैसी हस्तियों ने भी स्वर देकर गीतो को ऊंचाई बख्शी है । विपिन सचदेवा की मधुर आवाज मे हिन्दी भक्ति गीत महावीर बनिके … तो काफी लोकप्रिय हुआ था। हिंदू मुस्लिम दोनों के लिए समता भाव रखने वाले बेदम जलालाबादी की अलमारी में एक तरफ जहां मुस्लिम धर्म ग्रंथ कुरान रखा है तो बगल में हिंदू का पवित्र धर्म ग्रंथ रामायण भी ससम्मान देखने को मिलता है । कृष्ण राधिका का प्रेम प्रसंग ,नोकझोंक, हास-परिहास तो मानो आंखों के सामने सच बनकर उभरता प्रतीत होता है। अपनी उम्दा गीतों के जरिए हिंदुस्तान की प्रमुख कैसेट कंपनियों के दिलों में जगह बनाने वाले जनाब बेदम जलालाबादी कीे शेरो शायरी का तो कोई जवाब नहीं हिंदू मुस्लिम भाईचारा भंग करने वालों को जहां कड़ी फटकार लगाते हैं वहीं राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए खुशनुमा संदेश देने में भी नहीं चूकते । लिखते हैं कि –
“अगर तुम धर्म वाले हो तो हम ईमान वाले हैं ।
अगर तुम गीता वाले हो तो हम कुरान वाले हैं।
मगर यह बात बेदम की ना तुम भूलो ना हम भूले –
हम हिंदू मुस्लिम दोनों हिंदुस्तान वाले हैं।”

इसी तरह मादरे वतन से प्यार का इजहार कुछ इस तरह लिखते हुए लोगों से गुजारिश करते हैं कि –
“इतना करम तू मुझ पे कर देना दोस्तों,
खाके वतन में मुझको मिला देना दोस्तों।
बेदम हूं मेरी रूह जब निकलेगी बदन से,
मेरे कफन पर बस हिन्दुस्तान लिख देना दोस्तों। ”

मुशायरे के लिए कभी लिखे गए शेर –

“कहीं देखा नहीं हमने,बुजुर्गों ने बताया है।
पुराने सांप जो होते हैं, इच्छाधारी होते हैं।।”

ग़लती करने वालों के दिलों में बाण की तरह चुभने वाली उनकी रचना काफी पसंद आई थी। इसी तरह खादी को बदनाम करने वाले नेताओं पर भी तंज कसते हुए बेदम साहब ने लिखा —
“जो आजादी मिली हमको वह आजादी नहीं होती,
हमारे मुल्क की दिन-रात बर्बादी नहीं होती।
सभी नंगे नजर आते हमारे देश के नेता,
गुनाहों को छुपाने के लिए अगर खादी नहीं होती।।

आगे बेटियों के कातिलों पर भी बेदम साहब ने लोगों का ध्यान खींचा –

“पहले की तरह अब सियासत नहीं रही,

इज्जत लगी है दाव पर हिफाजत नहीं रही।
हिंदू की लड़कियां हो या मुस्लिम की लड़कियां ,
अब आबरू किसी की सलामत नहीं रही ।।”

सामाजिक फलक पर ऐसे अनेकानेक व्यंगों व रचनाओं से समाज सोचने को विवश कर वाहवाही लूटने वाले रचनाकार शायर
आज काफी हताश और उदास नजर आते है।आधा दर्जन परिवार के साथ मुफलिसी में जी रहे बेदम जलालाबादी साहब गीतों की एवज में मिल रहे सांत्वना धनराशि से किसी तरह गुजर बसर कर रहे हैं। वे शासन प्रशासन की उपेक्षा से अपने को उपेक्षित पाते हैं। कहते हैं कि गीत व्यवसाय बनने के बावजूद कोई पुरसा हाल नही है। भूमिहीन और गरीब होने के बावजूद वे सरकारी योजनाओं के लाभ से भी काफी दूर छूट गये लगते हैं । उनके चहेतों ने लाभ उठाया और बेदम साहब हाशिए पर रह गए। इसकी कसक आज भी उनके चेहरे पर दिखती है। अपनी बेबसी और बेहाली पर शासन प्रशासन व मीडिया का ध्यान खींचते हुए अपने संबंध में दो पंक्तियां अर्ज करते हुए कहते हैं —

“अहबाब मेरे जश्न मनाने में रह गए,
हम अपने घर की लाज बचाने में रह गए। आए वो मेरे घर को जलाकर चले गए ,
हम जिनके घर की आग बुझाने में रह गए।।”

रिपोर्ट – गौरी शंकर पाण्डेय

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