रचनाकारों ने साहित्य के जरिए मानवीय संवेदनाओं को दिया स्वर

गाजीपुर। मासिक रचनाकार संगोष्ठी में साहित्यकारों और कवियों ने सामाजिक विसंगतियों, संस्कृति, वृद्ध विमर्श, प्रकृति, देशभक्ति और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े विषयों पर अपनी बेबाक रचनाएं प्रस्तुत कर श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। वक्ताओं ने साहित्यिक गोष्ठियों को मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।


          शारदा ज्योति समाज की साहित्य धारा एवं उपनिषद मिशन के तत्वावधान में नगर के गौतम बुद्ध नगर कॉलोनी स्थित गांधी इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. सुधीर कुमार श्रीवास्तव के आवास पर आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ कवयित्री शालिनी श्रीवास्तव ने मां शारदा की स्वरचित वंदना से किया। 

        संगोष्ठी के उद्देश्य पर चर्चा करते हुए साहित्यकार माधव कृष्ण ने कहा कि साहित्य और रचनात्मक संवाद को निरंतर बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि गंभीर अध्येता और रचनाकार यदि साहित्यिक आयोजनों से दूर हो जाएंगे तो वैचारिक रिक्तता उत्पन्न होगी। उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से शहरी जीवन की विसंगतियों को भी रेखांकित किया।कहा कि “आदमी अकड़ा तना है, क्या कहीं हँसना मना है। कसाई का आदमी, त्योहार पर बकरा बना है। फूल अब खिलते कहाँ मेरे शहर में,
आदमी मिलते कहाँ मेरे शहर में।”

       डीएवी इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त अध्यापक एवं कवि प्रेम कुमार ‘प्रेम’ ने जीवन और मानवीय संबंधों पर केंद्रित रचना प्रस्तुत की – एक अदद आदमी की तलाश क्या है मुश्किल, खोजने से तो भगवान भी मिल जाता है। गीतकार हरिशंकर पांडेय ने वृद्ध विमर्श पर आधारित गीत के माध्यम से बुजुर्गों की भावनाओं और परिवार में उनके महत्व को स्वर दिया- अधिकारी बन बहुत जी लिए,
पुत्र रूप धर आओ तुम।
राह निहारे बूढ़ी अँखियाँ,
उनसे कुछ बतियाओ तो।” शायर गोपाल गौरव ने रूमानियत, देशभक्ति और एकाकीपन से जुड़े कई शेर प्रस्तुत किए। वहीं कवयित्री शालिनी श्रीवास्तव ने संस्कृति विमर्श पर आधारित कविता सुनाई। शिक्षिका कवयित्री पूजा राय ने बढ़ते शोर और पर्यावरण के प्रति मानवीय जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए प्रकृति के संसाधनों पर सभी के अधिकार और उनके संरक्षण का संदेश दिया। कहा कि – 

       साँस लेने की जगह सबकी,
हवा, पानी, बारिश, नदी सबकी है।
सबकी है धरती, सबका आकाश।
क्या इससे ही मिल जाता है अधिकार,
इन सभी को कम कर देने का भी…”

डॉ. राम अवध कुशवाहा ने समकालीन परिस्थितियों में सत्य और असत्य के मिश्रण पर केंद्रित व्यंग्य रचना प्रस्तुत कर वाहवाही लूटी कि- अब अपनी नई परिभाषा गढ़ रहा हूं
और अब मैं स्वयं अपने को ही पढ़ रहा हूं।

     अंत में आयोजक डॉ. सुधीर कुमार श्रीवास्तव एवं उनकी पत्नी ने सभी अतिथियों और रचनाकारों के प्रति आभार व्यक्त किया। संस्था के सचिव दिनेश्वर दयाल ने साहित्य धारा को नियमित रूप से जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई।

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