मेडिकल कॉलेज सेमिनार में स्पाइक मॉडल पर हुई विस्तृत चर्चा

डॉक्टर पेशेंट रिलेशनशिप इन हेल्थ प्रैक्टिसेज विषयक गोष्ठी में विशेषज्ञों ने रखा विचार



गाजीपुर। राजकीय होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज में चिकित्साभ्यास में रोगी चिकित्सक सम्बन्ध( डॉक्टर पेशेंट रिलेशनशिप इन हेल्थ प्रैक्टिसेज) विषयक सेमिनार सम्पन्न हुआ।
सेमिनार के मुख्य वक्ता महर्षि विश्वमित्र स्वायत्त राज्य चिकित्सा महाविद्यालय , गाज़ीपुर के कम्युनिटी विभाग के डॉ स्वतंत्र सिंह रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ प्राचार्य प्रो. डॉ राजेन्द्र सिंह एवं मुख्य वक्ता द्वारा मां सरस्वती के चित्र के सम्मुख पुष्प अर्पित कर किया गया।
       मुख्य वक्ता डॉ स्वतंत्र सिंह ने विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा स्वास्थ की परिभाषा बताते हुए, मरीजों से अपेक्षित व्यवहार करने, उनकी तकलीफों को ध्यान से सुनने एवं समझने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि चिकित्सक को अपनी बात सरल भाषा में मरीज को समझाना चाहिए, ताकि उसे अपनापन का बोध हो सके और वह चिकित्सक की बातों पर अमल कर सके। उन्होंने स्वास्थ्य सेवा में मरीजों को गंभीर या बुरी खबर संवेदनशीलता से देने के लिए 6-चरणीय संचार मॉडल ‘स्पाइक’ के बारे में भी विस्तारपूर्वक बताया।
       बताया गया कि स्पाइक मॉडल एक 6-चरणीय संरचना है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से चिकित्सा क्षेत्र में मरीजों को बुरे समाचार देने के लिए अपनाया जाता है। किया जाता है। यह मॉडल यह सुनिश्चित करता है कि संवाद में मरीज की भावनाओं को प्राथमिकता मिले। यह मॉडल सहानुभूति और स्पष्टता पर केंद्रित है, जिससे मरीज को मनोवैज्ञानिक रूप से कम नुकसान हो और संवाद का प्रभावी असर रहे। इसके लिए पहले चरण में मरीज के साक्षात्कार की व्यवस्था शांत और आरामदायक माहौल में तैयार करनी चाहिए जहां बातचीत बगैर बाधा के हो सके। दूसरे चरण में रोगी की धारणा का आकलन किया जाता है ताकि यह समझना जा सके कि मरीज अपनी बीमारी और स्थिति के बारे में क्या और कितना जानता है। तीसरे चरण में रोगी को जानकारी के लिए आमंत्रित करना होता है कि मरीज वास्तव में अपनी बिमारी के बारे में कितना और क्या जानना चाहता है। चौथे चरण में रोगी को उसकी बिमारी से सम्बन्धित बातें सरल और संतुलित भाषा में देना चाहिए अर्थात बुरी खबर भी अचानक न दें। पांचवें चरण में मरीज की भावनाओं जैसे डर, आंसू, गुस्सा आदि को स्वीकार करते हुए संवेदनशीलता से प्रतिक्रिया देना चाहिए। अंतिम चरण में रोगी की प्रतिक्रिया को समझते हुए सहानुभूति के साथ अंतिम निष्कर्ष की जानकारी देते हुए बातचीत को समेटना होता है।
         इसी क्रम में प्राचार्य डॉ राजेंद्र राजपूत ने संवाद और संचार का विस्तृत विवेचन करते हुए मौखिक एवं गैर मौखिक संचार, शब्दों का चयन, वाक्य विन्यास, भाषा की सहजता, आडियंस का प्रकार के अनुसार संचार के विभिन्न चरणों की आवश्यकता बताई। वहीं प्रो.डॉ सेंगर ने कम्युनिकेशन को होम्योपैथी से जोड़ कर आर्गेनन (फिलासफी) से संबद्ध बताया।
            कार्यक्रम में कॉलेज के सभी शिक्षक, अस्पताल प्रभारी, इंटर्न एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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