ग्रामीणांचल के सरकारी अस्पताल चल रहे हैं भगवान भरोसे

अस्पतालों में चिकित्सक रहते हैं नदारद, फार्मासिस्ट व अन्य स्टाफ बांटते हैं दवा


गाजीपुर। प्रदेश सरकार स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लाख दावे करे परन्तु वास्तविकता इससे कोसों दूर है। शहरी क्षेत्रों के सरकारी चिकित्सालयों में भले ही चिकित्सक मौजूद रहते हों लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सालयों की स्थिति एकदम विपरीत है। अनेकों चिकित्सालयों में नियुक्त चिकित्सक के दर्शन अस्पताल में यदाकदा ही होते हैं। वहां पहुंचने वाले मरीजों को दवा देकर टरकाने का काम वहां मौजूद स्टाफ करते रहते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों की दुर्व्यवस्था चरम पर है। अनेकों चिकित्सालयों में बेतरतीब उगे झाड़झंखार,सीलन,टूटी चहारदीवारी, जर्जर भवन उसके स्वास्थ्य की कहानी स्वयं बयां करते हैं। ग्रामीण जनों को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने वाले सरकारी अस्पताल स्वयं बीमार हैं।
इसकी बानगी सादात ब्लाक अंतर्गत नवीन प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भीमापार पर देखने को मिली। वहां तैनात प्रभारी चिकित्सक डा. आशीष मिश्रा प्रायः अस्पताल से नदारत रहते हैं। सोमवार से लगातार तीन दिन अनुपस्थित रहने के बाद जब मीडिया में बात फैली तो वह चौथे दिन गुरुवार को अस्पताल आये।
ग्रामीणों के अनुसार, वह हफ्ते में एक दिन लगने वाले आरोग्य मेला में ही मौजूद रहते हैं। अन्य दिन उनकी नामौजूदगी में फार्मासिस्ट अनिल यादव, वार्ड ब्वॉय दुर्गा सिंह और स्वीपर विनोद यादव अस्पताल की पूरी जिम्मेदारी संभालते हैं। अपनी बिमारी के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को फार्मासिस्ट अनिल यादव द्वारा दवा दी जाती है। इतना ही नहीं बल्कि वहां लैब असिस्टेंट की तैनाती नहीं है, जिससे मरीजों को जांच बाहर से ही कराना पड़ता है।
कुछ ऐसे ही हालात प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र मिर्जापुर का भी है। लोगों का कहना है कि वहां तैनात डा. एके राव और डा. यशवंत गौतम में जबरदस्त तालमेल है। प्रायः दो में से एक ही चिकित्सक मौजूद मिलते हैं अर्थात दोनों एक-एक दिन अस्पताल पर उपस्थित रहते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि दोनों चिकित्सक एक साथ कम ही दिन आते हैं। ऐसे में ग्रामीणांचल के मरीजों को अच्छी चिकित्सकीय सेवा देने का दावा महज हाथी के दांत बनकर रह गये हैं।
एक विभागीय कर्मी द्वारा अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर, दबी जुबान से बताया कि यहां नियुक्त चिकित्सकों का तालमेल जिले में मौजूद विभागीय उच्चाधिकारियों से होता है, और सारा खेल जिले पर बैठे विभागीय उच्चाधिकारियों के देखरेख में चलता है। यही कारण है कि सब कुछ जानने के बाद भी विभागीय उच्चाधिकारी कानों में तेल डाले पड़े रहते हैं और कभी किसी भी चिकित्सक के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई।

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