कम मेहनत, कम लागत से प्राप्त होगी धान की अधिक पैदावार

धान की नर्सरी डालने खेत में लेवा लगाने और रोपाई कराने से लें मुक्ति


गाजीपुर। नयी तकनीकी से धान की खेती अब लाभदायक हो रही है। इससे जहां समय,बीज और लागत में कमी आ रही है,वहीं धान की उपज भी बढ़ रही है।
फिल्ड टेक्नीशियन राजेश राय ने बताया कि
अंतरराष्ट्रीय मक्का व गेहूं अनुसंधान केंद्र (सीमिट) के निर्देशन में अब किसान धान की काफी क्षेत्र में बुवाई करते हुए अपनी पैदावार बढ़ाने में नई तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। पुरानी पद्धति से धान की खेती करना अब घाटे का सौदा हो गया है। धान की खेती के लिए पहले नर्सरी डालनी होती थी और फिर इक्कीस दिनों के बाद धान की रोपाई के लिए खेत में लेवा लगाकर मजदूरों के माध्यम से धान की रोपाई की जाती थी, इससे जहां समय और बीज का अपव्यय होता था वहीं मजदूरी में भी काफी धन खर्च होता था। उन्होंने बताया कि नयी तकनीकी द्वारा धान की खेती में न तो नर्सरी तैयार करने की जहमत है, न खेत में मजदूर लगाने की आवश्यकता है और ना ही नर्सरी से बेहन निकाल कर फिर खेत में रोपने की मेहनत है। नई तकनीक से बुवाई करने से तीनों प्रक्रिया समाप्त हो जाएंगी और कम बीज के द्वारा एक ही बार बुवाई कर देने से अच्छी पैदावार भी प्राप्त होगी।
कृषि वैज्ञानिक डॉ अजय कुमार व दीपक कुमार के नेतृत्व में जनपद के छपरी, सिखड़ी, चकदाउद, मैहर, चवर, मटेहूं, मरदह क्षेत्र के जागरूक किसानों ने करीब 3000 एकड़ से अधिक खेतों में सुपर सीड ड्रिल या जीरो ट्रील एज से धान की बुवाई की है। इसमें एक एकड़ खेत की बुआई में मात्र नौ किलो बीज लगता है और एक लाइन से धान की बुवाई हो जाती है। इस विधि से बुवाई करने से किसान की लगभग ₹3000 प्रति एकड़ की दर से लागत में कमी आती है और उपज भी अधिक होती है। इससे किसान को दोहरा लाभ प्राप्त होता है और उसे मजदूरों को एकत्र कर रोपाई कराने की चिंता से भी मुक्ति मिल जाती है।

उल्लेखनीय है कि बुधवार को अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान केंद्र वाराणसी के वैज्ञानिकों की टीम ने डॉ अशोक यादव व प्रदीप यादव के नेतृत्व में उड़ीसा के आए हुए 40 किसानों के साथ मरदह क्षेत्र के चवर गांव पहुंच कर धान की बोई गयी फसल का निरीक्षण किया। छपरी गांव के पूर्व सैनिक और किसान त्रिलोकी नाथ शर्मा ने बताया कि नमी वाले खेत में एक ही बार में इस नई तकनीक से हमने भी धान की बुवाई की है। इससे हमें न तो नर्सरी तैयार करने की जहमत उठानी पड़ी, ना ही लेबर लगाकर धान की रोपाई करानी पड़ी और मात्र एक ही दिन में बुआई समाप्त हो गयी और मैं सारी परेशानियों से मुक्त हो गया हूं।

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