कविता ! “विरोध देश द्रोह का है”

विरोध देश द्रोह का है”


शिक्षा के मंदिर में जाकर, क्या खूब जुटाई हमदर्दी।
पैसे के खातिर जमीर बेच, क्या खूब दिखाई बेशर्मी।।

जो भारत मुर्दाबाद कहे,उनका है तुमने साथ दिया।
अब किस मुंह से कहते हो, हमने है तुम्हारा विरोध किया।।

जिसने लक्ष्मी को झुलसाया, क्यों नाम छुपाया है उसका ।
जो शिक्षा को बदनाम करे, क्यों साथ दिया तुमने उसका।।

तुम कहती हो तुम भावुक हो, पीड़ित का साथ है मानवता।
जब उठी प्रियंका की अर्थी, तब कहाँ गई थी मानवता।।

माना तुमको पैसा प्यारा, पर नमक राष्ट्र का खाया है।
नुमाईस कर करके तुमने, सब धन भी यहीं कमाया है।।

यदि गुस्सा तुमको आता है,गुस्सा हमको भी आता है।
जो करे राष्ट्र से गद्दारी, उसे सबक सिखाना आता है।।

जिसे ज्ञान नहीं नर मादा का वो आज समर्थन करते हैं।
सीता लक्ष्मण का ज्ञान नहीं और बातें संविधान की करते हैं।।

तुमको तो पैसा प्यारा है, इज्जत जाए तो चल जाए।
हमको तो देश यह प्यारा है, गरदन कटती हो कट जाए।।

तुम हुनर बेचने वाले हो, मैं कलम चलाने वाला हूँ।
तुम जयचंदो के उपासक हो, मैं भूषण और निराला हूँ।

मेरा लिखना यदि खलता है,तो देश प्रेम अपनाओ तुम।
पूरब पश्चिम सा अभिनय कर, क्रांति वीर बन जाओ तुम।।

हमें विरोध नहीं फिल्मों का,न लोभ हमें पैसों का है।
हम तो बस कलम के साधक हैं,यह विरोध देश द्रोह का है।।

कवि – अशोक राय वत्स
रैनी,मऊ, उत्तरप्रदेश

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