पर्यावरण संरक्षण वर्तमान समय की आवश्यकता – डा. ए. के. राय

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष                                         प्रचण्ड गर्मी, तपन और उमस ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। तापमान का आलम यह है कि पारा हाफ सेंचुरी तक पहुंचने के लिए तड़प रहा है। मनुष्य का शरीर का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस नियत है। इससे अधिक तापमान होने पर बुखार होना माना जाता है। इससे अधिक तापमान शरीर के लिए हानिकारक होता है, मगर इस समय गर्मी का आलम यह है वातावरणीय तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से बढ़ चला है। अपने ही देश में कहीं कहीं पारा 50 डिग्री सेल्सियस से उपर तक जा पहुंचा है।                                                मेडिकल जर्नल ‘लैंसेट’ के मुताबिक अगर वातावरणीय तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाए, तो शरीर की मांसपेशियां सुस्ती का शिकार हो जाती हैं। मांशपेशियां जवाब देने लगती हैं। मानव जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण अंगों के काम करना बंद करने से लेकर हृदयाघात (हार्ट अटैक) जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।                                   कहने का तात्पर्य यह है कि अब गर्मी तो गर्मी जानलेवा होती जा रही है और यह अचानक नहीं हुआ है बल्कि प्राकृतिक तापमान शनै शनै साल दर साल बढ़ता जा रहा है।                         जलवायु परिवर्तन (ग्लोबल वार्मिंग) पृथ्वी और उस पर रहने वाले प्राणियों के अस्तित्व के लिए संकट बनता जा रहा है। इसके लिए वनों की अंधाधुंध कटाई के साथ ही साथ बढ़ता प्रदूषण, रसायनों तथा रेडियो एक्टिव पदार्थों का बढ़ता प्रयोग, कल कारखाने और जनसंख्या वृद्धि भी जिम्मेदार है।                   खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक़ वर्ष 2015 से 2020 के बीच भारत में प्रति वर्ष 6 लाख 68 हजार हेक्टेयर वनों का अस्तित्व समाप्त हो गया। इसी दौर में करीबन 4 लाख 14 हजार हेक्टेयर प्राकृतिक वन भी नेस्तनाबूत कर दिया गया। इनके अलावा पिछले दो दशकों में 2 करोड़ 33 लाख हेक्टेयर वृक्ष आच्छादित क्षेत्र के पेड़ उखाड़े गए। नेशनल हाईवे आदि के निर्माण के नाम पर किये गए विनाश को विकास बताया गया। जल-जंगल-जमीन से जुड़े क़ानून को ताक पर रखकर बनों का सर्वनाश किया गया। नतीजा यह निकला कि जंगल नेस्तनाबूत कर दिए, नदियाँ सुख गयीं, धरती खोदकर रख दी, सिर्फ आदिवासियों और परम्परागत वनवासियों को ही नहीं, पशुपक्षियों को भी उनके घरों से बेदखल कर दिया, पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) का दम घुट गया। धरती का गला सूख रहा है पृथ्वी धधक रही है, सड़कें आग उगल रही हैं।                                         पर्यावरण संरक्षण हेतु विश्व पर्यावरण दिवस हर वर्ष पांच जून को मनाया जाता है ताकि हम पर्यावरण संरक्षण के प्रति सतर्क हो सकें। इसे बचाने के लिए प्लास्टिक के बढ़ते प्रयोग पर रोक लगाने हेतु लोगों को स्वयं आगे आना होगा। वहीं मनुष्यों के मनमानी से प्रदुषित वातावरण से त्रस्त अनेकों जीव-जंतु हमेशा के लिए विलुप्त होने की कगार पर हैं। आज गौरैया, गिद्ध जैसे अनेकों जीव मोबाइल टावर के रेडिएशन, इंसेक्टिसाइड, पेस्टिसाइड के इस्तेमाल, अंधाधुंध शिकार, प्रदुषण और ऐसी ही अन्य चीजों से समाप्त के कगार पर हैं। इतना ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में लगभग 55 लाख लोग प्रति वर्ष दूषित हवा के कारण मौत के मुंह में जा रहे हैं।  बढ़ते प्रदुषण से मैदानी इलाकों के साथ साथ पहाड़ी इलाकों में भी तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि, लू और गर्मी की प्रचण्डता बढ़ी है।    निस्संदेह यह सब प्रकृति के बिगड़ते मिजाज और बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के भयावह दुष्परिणाम हैं। वायु प्रदूषण के चलते प्रतिवर्ष लाखों लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं। कार्बन उत्सर्जन के मामले में दिल्ली दुनिया के 30 शीर्ष प्रदुषित शहरों में है। एसी,फ्रिज से उत्सर्जित व कुड़े से निकलती जहरीली गैस, औद्योगिक इकाइयों से निकलते धुएं, सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या से कार्बन उत्सर्जन से निकली प्रदूषित वायु मानव शरीर के फेफड़ों के अतिरिक्त त्वचा और आंखों को भी भयंकर रूप से नुकसान पहुंचा रही है। इसके साथ ही आज विभिन्न स्रोतों द्वारा बेहिसाब पानी की बर्बादी के चलते भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिर रहा है। कुछ इलाकों में गर्मी के मौसम में भूजल स्तर इतना नीचे चला जाता है कि पानी के लिए वाटर-टैंक्स पर निर्भर होना पड़ रहा है। आज हम पर्यावरण में इतनी अधिक कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ रहे हैं कि समुद्र तक का पानी अम्लीय होता जा रहा है, हमने घर बनाने के लिए इतने जंगल काट दिए हैं कि आज वायुमंडल खतरे में पड़ गया है। इतना ही नहीं बल्कि रासायनिक उर्वरकों के मनमान प्रयोग ने खेतों को इतना ज़हरीला बना दिया है कि उनमे उगने वाली सब्जियां व अन्न भी हानिकारक हो रहे हैं। इनके प्रयोग से मानव के किडनी, लीवर तथा हृदय रोगों में ईजाफा हो रहा है। वायुमंडल में बढ़ रही हानिकारक गैसों से भूमंडलीय गर्मी अब हमें महसूस होने लगी है। करोड़ों सालों से जमे ग्लेशियर्स जितनी तेजी से पिघल रहे हैं उतनी तेजी से कभी नही पिघले थे। इतने पर भी यदि हम पर्यावरण संरक्षण हेतु सचेष्ट नहीं हुए तो शायद बाद में हमें इसका मौका भी ना मिले और आगे आने वाली पीढियां हमे इस भयंकर गलती के लिए कभी माफ़ न करें।
             इससे बचाव हेतु हमें भूमिगत जलनाशक विदेशी यूकेलिप्टस पेड़ों के रोपण पर रोक लगाने और अपने जीवन के यादगार दिवसों पर पौधारोपण कर समाज व पर्यावरण हित में कार्य करना होगा। इसके लिए अब सार्वजनिक स्थानों पर पीपल के वृक्षों का रोपण करना चाहिए, क्योंकि पीपल वृक्ष कार्बन डाई ऑक्साइड का 100 फिसदी अवशोषक है तो बरगद 80 फिसदी और नीम 75 फिसदी अवशोषक है। पर्यावरण दिवस को सार्थक बनाने हेतु हम प्रण करने की जरूरत है कि हम प्लास्टिक का पूर्ण रुप से वहिष्कार करेंगें, पानी का अनावश्यक दुरुपयोग रोकेंगे, किसानों को खेती में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खाद के उपयोग हेतु प्रेरित करेंगे और वृक्षारोपण कर बसुंधरा को हरा भरा बनाने में सहयोग करेंगे,तभी पर्यावरण सुरक्षित रह सकेगा।                              


Views: 17


Leave a Reply