सूरत क्या चीज है, सीरत का दीवाना बनो, मस्ती रहे तेरी बस्ती में, ऐसा तू मस्ताना बनो”

गाज़ीपुर। फागुन की मादक बयार, वसंत की नव-हरित आभा और होली की रंग-रश्मियों से आलोकित वातावरण में ग्राम खैराबारी की साहित्य-संवेदनशील धरती पर एक गरिमामय एवं भावसमृद्ध होली मिलन समारोह एवं कवि सम्मेलन का भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ। रंग और रस के इस उत्सव ने लोक जीवन की सहज उल्लास-धारा को साहित्यिक अभिव्यक्ति के साथ संयोजित किया गया।


         शिक्षक नेता दिनेश चन्द्र राय की अध्यक्षता और अक्षय पाण्डेय के संचालन में आयोजित कार्यक्रम के संयोजक दिनेशचन्द्र शर्मा ने कवियों एवं अतिथियों को अंगवसन प्रदान कर सम्मानित किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ नेहा शर्मा के स्वागत गीत से हुआ, जिसने मानो वसंत के कोमल रंगों को स्वर प्रदान कर दिया, तत्पश्चात् कवयित्री प्रीतम कुशवाहा की वाणी-वन्दना से वातावरण में साहित्यिक पवित्रता और सांस्कृतिक गरिमा का संचार हुआ।

             काव्यपाठ के क्रम में युवा ग़ज़लकार गोपाल गौरव ने अपनी पंक्तियाँ “हमने कब आपसे तलवार की बातें की हैं, हमने अब तक तो फ़क़त प्यार की बातें की हैं।” प्रस्तुत कर श्रोताओं की भरपूर सराहना अर्जित की तो कवि हरिशंकर पाण्डेय ने भोजपुरी की मार्मिक पंक्तियों “भाई से भाई क बनत आज नईखे, दिलवा से दिलवा मिलता आज नईखे/बाटे ना केहू हमजोली हो, कइसे खेलीं हम होली।”के माध्यम से सामाजिक और पारिवारिक दूरियों पर संवेदना व्यक्त की। वरिष्ठ गीतकार गौरीशंकर पाण्डेय ‘सरस’ ने अपने लोक-व्यंग्यात्मक गीत “धनिया कहना ल मानी, अबकी दाईं लड़ा प्रधानी/चानी काटी घर भर परानी।” से तीखा व्यंग्य प्रस्तुत किया। नवगीतकार डॉ. अक्षय पाण्डेय ने “एक पल तू गीत जैसा मन बना ले/संग मेरे गुनगुना ले/वक्त की खामोशियाँ छँट जाएँगी।” सुनाकर जीवन में संवेदना, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संरक्षण का संदेश दिया।

कवयित्री प्रीतम कुशवाहा की पंक्तियाँ “सूरत क्या ये चीज है यारों, सीरत का दीवाना बनो, मस्ती रहे तेरी बस्ती में, ऐसा तू मस्ताना बनो” ने श्रोताओं के हृदय को भाव-विभोर कर दिया। महाकवि कामेश्वर द्विवेदी ने सवैया छन्द में प्रोषितपतिका नायिका की विरह-वेदना को व्यक्त करते हुए कहा “प्रिय कंत बिना मन व्याकुल है यह/आग लगे इस फागुन में।” तो वीररस के प्रखर कवि दिनेशचन्द्र शर्मा ने “शहीदों के चिराग को गुलशन से बुझने नहीं देंगे के माध्यम से श्रोताओं के भीतर राष्ट्रभाव और ओज का संचार किया। कवि सुदर्शन कुशवाहा ‘चिराग’ ने अपनी पंक्तियों “शहीदों के लहू पर दाग हम लगने नहीं देंगे, इस पावन तिरंगे को कभी झुकने नहीं देंगे” सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

       कार्यक्रम के अंत में डाॅ. व्यासमुनि राय के प्रेरक उद्बोधन तथा अध्यक्षीय वक्तव्य में दिनेश चन्द्र राय की लोकहितचिन्तन से ओतप्रोत वाणी ने उपस्थित जनसमुदाय को गहराई से प्रभावित किया।

            इस अवसर पर शशिकान्त राय, राजेन्द्र राय, पारस पाठक, आकांक्षा शर्मा, सौरभ राय, रामेश्वर राय, चन्द्रमा राम, अवधेश यादव सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। अंत में विनोद राय ने सभी कवियों, अतिथियों और उपस्थित जनसमुदाय के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।

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