गणेश चतुर्थी 2019 ! गणेश जन्मोत्सव 2019

वाराणसी,01 सितम्बर 2019 । हिन्दु धर्म ग्रन्थों व शिव पुराण के अनुसार ऋद्धि-सिद्धि के दाता विघ्नहर्ता गणेश जी का जन्म भाद्रशुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को बताया गया है। दस दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव का आरम्भ इसी दिन गणेश जी के जन्म के साथ आरम्भ होता है। चतुर्थी तिथि से लेकर अनन्त चतुर्दशी तक की जाने वाली गणेश पूजा का अपना एक विशेष महत्व है। वैसे तो प्रत्येक माह के कृष्ण व शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी नाम से जाना जाता है। सनातनी परम्परा के अनुसार गणेशजी को प्रथम पूज्य माना गया है।
इस वर्ष गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी) 2 सितंबर 2019 दिन सोमवार
गणेश चतुर्थी तिथि का आरंभ- प्रातः 04:56 से तथा चतुर्थी तिथि की समाप्ति रात्रि – 01:53 (3 सितंबर 2019)को होगी।
गणेश पूजन के लिए अभिजित मुहुर्त –
2 सितंबर को 11:05 से 13:36 दोपहर तक प्रारंभ कर लेना चाहिए।
विशेष मुहूर्त में
अमृत चैघड़िया – प्रातः 6.10 से 7.44 तक,
शुभ चैघड़िया- प्रातः 9.18 से 10.53 तक
लाभ चैघड़िया- दोपहर बाद 3.35 से 5.09 तक रहेगा।
भगवान गणेश जी वैदिक काल से लेकर आजतक सर्वविदित एवं पूजित हैं। वेदों में गणेशजी की पूजा अर्चना का वर्णन है। रुद्राष्टाध्यायी का प्रारंभ भी गणेश के मंत्रों से ही होता है साथ ही पंचदेव (गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव एवं दूर्गा) में इनका स्थान प्रमुख है।
ज्योतिष की दृष्टि में इस वर्ष गणेश चतुर्थी में चतुर्ग्रही योग बन रहा है जो कालपुरूष के पत्रिका के अनुसार पंचम भाव में बन रहा है । सिंह राशि में सूर्य, बुध, मंगल एवं शुक्र का योग होना निश्चय ही शुभ फलदायी है। पंचम स्थान से बुद्धि और विवेक की बात की जाती है इसलिए जो भी इस वर्ष पुरी श्रद्धा से इनकी पूजा अर्चना करेंगे उनको विशेष लाभ प्राप्त होगा । धन चाहने वालों को शुक्र विपुल धन की प्राप्ति करा सकते हैं। यश संतान एवं आंखों की रोशनी की कामना रखने वालों को सूर्य देव की कृपा प्राप्त होगी। सामर्थ्य, साहस एवं बल चाहने वालों को मंगल का आशीष मिल सकता है और विद्या एवं बुद्धि चाहने वालों को बुध देव की कृपा प्राप्त हो सकती है। इसलिए इस वर्ष बुद्धि के दाता गणेश जी की जयन्ती का बहुत महत्व है ।
अनन्त चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन
महाराष्ट्र में गणेश जन्मोत्सव घर-घर में मनाया जाता है। गणेश जयन्ती के अवसर पर श्रद्धालु जन अपने अपने घरों में गणपति की प्रतिमा रखकर श्रद्धा के साथ पूजन करते हैं। अनेक स्थानों पर सामाजिक स्तर पर भी अपने सामर्थ्य एवं परम्पराओं के अनुकुल बड़े-बड़े पंडाल लगाकर इनकी पूजा अर्चना की जाती है और पंडाल में इनकी दस दिनों तक पूजा की जाती है और अनन्त चतुर्दशी के दिन इनका विसर्जन किया जाता है। गणपति बप्पा मोरया अगले बरस तु जल्दी आ।… विसर्जन के समय यह उद्घोष सभी के आंखों को नम कर जाता है इससे यह प्रतीत होता है कि लोग बप्पा से कितना प्रेम करते हैं।

कैसे करें गणपति की स्‍थापना
गणपति की स्‍थापना गणेश चतुर्थी के दिन मध्‍याह्न में की जाती है। मान्‍यता है कि गणपति का जन्‍म मध्‍याह्न काल में हुआ था। साथ ही इस दिन चंद्रमा देखना वर्जित है।

गणपति की स्‍थापना की विधि
गणपति बप्‍पा की मूर्ति स्‍थापना करने से पहले स्‍नान करने के बाद नए या साफ धुले वस्‍त्र पहनकर शुद्ध भाव से पूजन करना चाहिए। इसके बाद अपने माथे पर तिलक लगाएं और पूर्व दिशा की ओर मुख कर साफ आसन पर बैठकर गणेश जी की प्रतिमा को किसी लकड़ी के पटरे या गेहूं, मूंग, ज्‍वार के ऊपर लाल वस्‍त्र बिछाकर स्‍थापित करें। गणपति की प्रतिमा के दाएं-बाएं रिद्धि-सिद्धि के प्रतीक स्‍वरूप एक-एक सुपारी रखें। स्‍थापना के बाद पुजन स्थल पर सर्वप्रथम घी का दीपक जलाकर पूजा का संकल्‍प लें। फिर गणेश जी का ध्‍यान करने के बाद उनका आह्वन करें और फिर गणेशजी को सर्वप्रथम जल से, फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और चीनी का मिश्रण) और पुन: शुद्ध जल से स्‍नान कराएं। इसके बाद गणेश जी को वस्‍त्र चढ़ाएं और प्रतिमा पर सिंदूर, चंदन, फूल और फूलों की माला अर्पित करते हुए सुगन्धित धूप से पूजन करें। इसके बाद एक दूसरा दीपक जलाकर गणपति की प्रतिमा को दिखाकर हाथ धो लें। हाथ पोंछने के लिए नए कपड़े का इस्‍तेमाल करें,फिर नैवेद्य चढ़ाएं। नैवेद्य में मोदक, मिठाई, गुड़ और फल शामिल करें। इसके बाद गणपति को नारियल और दक्षिणा चढायें। पूजन पूर्ण होने के बाद अब परिवार के साथ गणपति की आरती करें। गणेश जी की आरती कपूर के साथ घी में डूबी हुई एक या तीन या इससे अधिक बत्तियां बनाकर की जाती है। इसके बाद हाथों में फूल लेकर गणपति के चरणों में पुष्‍पांजलि अर्पित कर गणपति की परिक्रमा करें। यह ध्‍यान रहे कि गणपति की परिक्रमा सिर्फ एक बार ही करें। इसके बाद गणपति से किसी भी तरह की भूल-चूक के लिए माफी मांगते हुए अंत में साष्टांग प्रणाम करें।
विघ्न विनाशक भगवान श्रीगणेश का निम्र मंत्रों से जप करने से विघ्न, आलस्य, रोग आदि का तत्काल निवारण होता है। गणपति जी का बीज मंत्र ‘गं’ है। इनसे युक्त मंत्र ॐ गं गणपतये नम:’ का जप करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।
षडाक्षर मंत्र का जप आर्थिक प्रगति व समृद्धि प्रदायक है : ॐ वक्रतुंडाय हुम्म् ।

किसी के द्वारा की गयी अनिष्टकारक क्रिया को नष्ट करने, विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए उच्छिष्ट गणपति की साधना करनी चाहिए। इनका जप करते समय मुंह में गुड़, लौंग, इलायची, बताशा, सुपारी होनी चाहिए। यह साधना अक्षय भंडार प्रदान करने वाली है। उच्छिष्ट गणपति का मंत्र : ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा
आलस्य, निराशा, कलह, विघ्न दूर करने के लिए विघ्नराज रूप की आराधना का यह मंत्र जपें : गं क्षिप्रप्रसादनाय नम:
विघ्न को दूर करके धन व आत्मबल की प्राप्ति के लिए हेरम्ब गणपति का मंत्र जपें : ॐ गूं नम:

रोजगार की प्राप्ति व आर्थिक वृद्धि के लिए लक्ष्मी विनायक मंत्र का जप करें : ॐ श्रीं गं सौभ्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
विवाह में आने वाले दोषों को दूर करने के लिए त्रैलोक्य मोहन गणेश मंत्र का जप करने से शीघ्र अनुकूल जीवनसाथी की प्राप्ति होती है : ॐ वक्रतुंडैक दंष्ट्राय क्लीं ह्वीं श्रीं गं गणपते वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
उपरोक्त मंत्रों के अतिरिक्त गणपति अथर्वशीर्ष, संकटनाशन गणेश स्रोत, गणेशकवच, संतान गणपति स्तोत्र, ऋणहर्ता गणपति स्तोत्र, मयूरेश स्तोत्र, गणेश चालीसा का पाठ करने से प्रथम पूज्य गणेश जी की कृपा मिलती है।

वाराणसी,01 सितम्बर 2019 । हिन्दु धर्म ग्रन्थों व शिव पुराण के अनुसार ऋद्धि-सिद्धि के दाता विघ्नहर्ता गणेश जी का जन्म भाद्रशुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को बताया गया है। दस दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव का आरम्भ इसी दिन गणेश जी के जन्म के साथ आरम्भ होता है। चतुर्थी तिथि से लेकर अनन्त चतुर्दशी तक की जाने वाली गणेश पूजा का अपना एक विशेष महत्व है। वैसे तो प्रत्येक माह के कृष्ण व शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी नाम से जाना जाता है। सनातनी परम्परा के अनुसार गणेशजी को प्रथम पूज्य माना गया है।
इस वर्ष गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी) 2 सितंबर 2019 दिन सोमवार
गणेश चतुर्थी तिथि का आरंभ- प्रातः 04:56 से तथा चतुर्थी तिथि की समाप्ति रात्रि – 01:53 (3 सितंबर 2019)को होगी।
गणेश पूजन के लिए अभिजित मुहुर्त –
2 सितंबर को 11:05 से 13:36 दोपहर तक प्रारंभ कर लेना चाहिए।
विशेष मुहूर्त में
अमृत चैघड़िया – प्रातः 6.10 से 7.44 तक,
शुभ चैघड़िया- प्रातः 9.18 से 10.53 तक
लाभ चैघड़िया- दोपहर बाद 3.35 से 5.09 तक रहेगा।
भगवान गणेश जी वैदिक काल से लेकर आजतक सर्वविदित एवं पूजित हैं। वेदों में गणेशजी की पूजा अर्चना का वर्णन है। रुद्राष्टाध्यायी का प्रारंभ भी गणेश के मंत्रों से ही होता है साथ ही पंचदेव (गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव एवं दूर्गा) में इनका स्थान प्रमुख है।
ज्योतिष की दृष्टि में इस वर्ष गणेश चतुर्थी में चतुर्ग्रही योग बन रहा है जो कालपुरूष के पत्रिका के अनुसार पंचम भाव में बन रहा है । सिंह राशि में सूर्य, बुध, मंगल एवं शुक्र का योग होना निश्चय ही शुभ फलदायी है। पंचम स्थान से बुद्धि और विवेक की बात की जाती है इसलिए जो भी इस वर्ष पुरी श्रद्धा से इनकी पूजा अर्चना करेंगे उनको विशेष लाभ प्राप्त होगा । धन चाहने वालों को शुक्र विपुल धन की प्राप्ति करा सकते हैं। यश संतान एवं आंखों की रोशनी की कामना रखने वालों को सूर्य देव की कृपा प्राप्त होगी। सामर्थ्य, साहस एवं बल चाहने वालों को मंगल का आशीष मिल सकता है और विद्या एवं बुद्धि चाहने वालों को बुध देव की कृपा प्राप्त हो सकती है। इसलिए इस वर्ष बुद्धि के दाता गणेश जी की जयन्ती का बहुत महत्व है ।
अनन्त चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन
महाराष्ट्र में गणेश जन्मोत्सव घर-घर में मनाया जाता है। गणेश जयन्ती के अवसर पर श्रद्धालु जन अपने अपने घरों में गणपति की प्रतिमा रखकर श्रद्धा के साथ पूजन करते हैं। अनेक स्थानों पर सामाजिक स्तर पर भी अपने सामर्थ्य एवं परम्पराओं के अनुकुल बड़े-बड़े पंडाल लगाकर इनकी पूजा अर्चना की जाती है और पंडाल में इनकी दस दिनों तक पूजा की जाती है और अनन्त चतुर्दशी के दिन इनका विसर्जन किया जाता है। गणपति बप्पा मोरया अगले बरस तु जल्दी आ।… विसर्जन के समय यह उद्घोष सभी के आंखों को नम कर जाता है।

गणपति की स्‍थापना गणेश चतुर्थी के दिन मध्‍याह्न में की जाती है। मान्‍यता है कि गणपति का जन्‍म मध्‍याह्न काल में हुआ था। साथ ही इस दिन चंद्रमा देखना वर्जित है।

गणपति की स्‍थापना की विधि
गणपति बप्‍पा की मूर्ति स्‍थापना करने से पहले स्‍नान करने के बाद नए या साफ धुले वस्‍त्र पहनकर शुद्ध भाव से पूजन करना चाहिए। इसके बाद अपने माथे पर तिलक लगाएं और पूर्व दिशा की ओर मुख कर साफ आसन पर बैठकर गणेश जी की प्रतिमा को किसी लकड़ी के पटरे या गेहूं, मूंग, ज्‍वार के ऊपर लाल वस्‍त्र बिछाकर स्‍थापित करें। गणपति की प्रतिमा के दाएं-बाएं रिद्धि-सिद्धि के प्रतीक स्‍वरूप एक-एक सुपारी रखें। स्‍थापना के बाद पुजन स्थल पर सर्वप्रथम घी का दीपक जलाकर पूजा का संकल्‍प लें। फिर गणेश जी का ध्‍यान करने के बाद उनका आह्वन करें और फिर गणेशजी को सर्वप्रथम जल से, फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और चीनी का मिश्रण) और पुन: शुद्ध जल से स्‍नान कराएं। इसके बाद गणेश जी को वस्‍त्र चढ़ाएं और प्रतिमा पर सिंदूर, चंदन, फूल और फूलों की माला अर्पित करते हुए सुगन्धित धूप से पूजन करें। इसके बाद एक दूसरा दीपक जलाकर गणपति की प्रतिमा को दिखाकर हाथ धो लें। हाथ पोंछने के लिए नए कपड़े का इस्‍तेमाल करें,फिर नैवेद्य चढ़ाएं। नैवेद्य में मोदक, मिठाई, गुड़ और फल शामिल करें। इसके बाद गणपति को नारियल और दक्षिणा चढायें। पूजन पूर्ण होने के बाद अब परिवार के साथ गणपति की आरती करें। गणेश जी की आरती कपूर के साथ घी में डूबी हुई एक या तीन या इससे अधिक बत्तियां बनाकर की जाती है। इसके बाद हाथों में फूल लेकर गणपति के चरणों में पुष्‍पांजलि अर्पित कर गणपति की परिक्रमा करें। यह ध्‍यान रहे कि गणपति की परिक्रमा सिर्फ एक बार ही करें। इसके बाद गणपति से किसी भी तरह की भूल-चूक के लिए माफी मांगते हुए अंत में साष्टांग प्रणाम करें।
विघ्न विनाशक भगवान श्रीगणेश का निम्र मंत्रों से जप करने से विघ्न, आलस्य, रोग आदि का तत्काल निवारण होता है। गणपति जी का बीज मंत्र ‘गं’ है। इनसे युक्त मंत्र ॐ गं गणपतये नम:’ का जप करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।
षडाक्षर मंत्र का जप आर्थिक प्रगति व समृद्धि प्रदायक है : ॐ वक्रतुंडाय हुम्म्

किसी के द्वारा की गयी अनिष्टकारक क्रिया को नष्ट करने, विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए उच्छिष्ट गणपति की साधना करनी चाहिए। इनका जप करते समय मुंह में गुड़, लौंग, इलायची, बताशा, सुपारी होनी चाहिए। यह साधना अक्षय भंडार प्रदान करने वाली है। उच्छिष्ट गणपति का मंत्र : ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा
आलस्य, निराशा, कलह, विघ्न दूर करने के लिए विघ्नराज रूप की आराधना का यह मंत्र जपें : गं क्षिप्रप्रसादनाय नम:
विघ्न को दूर करके धन व आत्मबल की प्राप्ति के लिए हेरम्ब गणपति का मंत्र जपें : ॐ गूं नम:

रोजगार की प्राप्ति व आर्थिक वृद्धि के लिए लक्ष्मी विनायक मंत्र का जप करें : ॐ श्रीं गं सौभ्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
विवाह में आने वाले दोषों को दूर करने के लिए त्रैलोक्य मोहन गणेश मंत्र का जप करने से शीघ्र अनुकूल जीवनसाथी की प्राप्ति होती है : ॐ वक्रतुंडैक दंष्ट्राय क्लीं ह्वीं श्रीं गं गणपते वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
उपरोक्त मंत्रों के अतिरिक्त गणपति अथर्वशीर्ष, संकटनाशन गणेश स्रोत, गणेशकवच, संतान गणपति स्तोत्र, ऋणहर्ता गणपति स्तोत्र, मयूरेश स्तोत्र, गणेश चालीसा का पाठ करने से प्रथम पूज्य गणेश जी की कृपा मिलती है।

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Author: Dr. A. K Rai

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