भारत रत्न ! पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी,नानाजी देशमुख व भूपेन हजारिका को मिला सम्मान

नई दिल्ली,09 अगस्त 2019। राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में कल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, दिवंगत समाजसेवी नानाजी देशमुख और दिवंगत संगीतकार भूपेन हजारिका को देश के सबसे बड़े खिताब भारत रत्न सम्मान से नवाजा गया।
इन तीन महान विभूतियों को भारत रत्न सम्मान प्रदान करने की घोषणा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर 25 जनवरी को की गयी थी।
बताते चलें कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का भारतीय राजनीति में बड़ा योगदान था रहा राष्ट्रपति बनने से पूर्व में केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में कई मंत्रालयों की जिम्मेदारियां संभाल चुके थे उन्होंने अपना कैरियर कोलकाता में डिप्टी अकाउंटेंट जनरल के कार्यालय में क्लर्क के रूप में शुरू किया था और फिर अपनी मेहनत और बुद्धिमता से आगे बढ़ते गए। उनका जन्म पश्चिम बंगाल के बीरभूमि जिले के मीराटी नामक गांव के ब्राह्मण परिवार में 11 दिसंबर 1935 को हुआ था। इनके पिता कामदा किंकर मुखर्जी क्षेत्र के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी रहे। आजादी की लड़ाई में वे 10 वर्षों से अधिक समय तक ब्रिटिश जेलों में कैद रहे और फिर 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता बने। देश की आजादी के बाद वह 1952 से लेकर 1964 तक पश्चिम बंगाल विधान परिषद के सदस्य रहे। प्रणव मुखर्जी ने पिता का हाथ थाम राजनीति में प्रवेश के साथ ही साथ पत्रकारिता करते हुए कोलकाता विश्वविद्यालय के सूरी विद्यासागर कॉलेज से स्नातक और कोलकाता यूनिवर्सिटी से इतिहास और राजनीति विज्ञान में परास्नातक की पढ़ाई पूरी की थी। कोलकाता विश्वविद्यालय से ही कानून की डिग्री लेने के बाद वह बीरभूम जिले के एक कॉलेज में प्रोफेसर की नौकरी आरंभ की और वकील के रूप में भी कार्य किया। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1969 में हुई जब वह पहली बार राज्य सभा से चुनकर भारतीय संसद में पहुंचे, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनकी योग्यता से प्रभावित होकर मात्र 35 वर्ष की अवस्था में उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया था। उसके बाद हुए 1975, 1981, 1993 और 1999 में राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए । वह पहली बार लोकसभा के लिए पश्चिम बंगाल के जंगीपुर निर्वाचन क्षेत्र से 13 मई 2004 को निर्वाचित हुए। फिर उसी क्षेत्र से 2009 मे सांसद चुने गए। 2004 में उन्हें भारत के रक्षा मंत्री के रूप में और फिर 24 अक्टूबर 2006 को भारत का विदेश मंत्री नियुक्त किया गया था।

   कई भाषाओं के ज्ञाता भूपेन हजारिका का जन्म 8 सितंबर 1926 को ओसोम में हुआ था । मां के प्रेरणा से 10 वर्ष की उम्र में ही वह असमिया भाषा में गाना गाने लगे। 1936 में कोलकाता में अपना पहला गाना रिकॉर्ड किया था। मात्र 13 साल की उम्र में हजारिका ने अपना पहला गाना लिखा था। उन्होंने 1942 में इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से परास्नातक की डिग्री हासिल की और इसके बाद गुवाहाटी में ऑल इंडिया रेडियो में गायन आरंभ किया । बाद में वह स्टेज परफारमेंस भी देने लगे, इसी क्रम में वह कोलंबिया यूनिवर्सिटी गए जहां उनकी भेंट प्रियंवदा पटेल से हुई थी और दोनों ने 1950 में शादी कर ली। 1992 में उनके पुत्र तेज हजारिका ने जन्म लिया। 1953 में वे अपने परिवार के साथ भारत लौट आए और उन्होंने गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में शिक्षक के रूप में काम किया। बाद में हजारिका ने म्यूजिक को अपना साथी बनाया और रुदाली, मिल गई मंजिल मुझे, साज, दरमियां गज गामिनी, मन जैसी अनेकों कामयाब सुपरहिट फिल्मों में गीत दिए। उन्होंने अपने जीवन काल में करीब 1000 गाने और 15 पुस्तकें लिखी, साथ ही साथ स्टार टीवी के सीरियल डान को भी प्रोड्यूस किया। म्यूजिक के क्षेत्र में उनके अद्भुत योगदान के लिए 1975 में उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार और 1992 में सिनेमा जगत के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के सम्मान तथा 2009 में असोम रत्न और संगीत नाटक अकादमी अवार्ड तो फिर 2011 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

    समाज सेवक और विचारक नानाजी देशमुख का जन्म 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के कडोली नामक गांव में हुआ था। गरीबी और अभाव में बचपन व्यतीत हुआ था। कर्मयोगी के रुप में वे वगैर किसी मदद के स्वयं आगे बढ़ते रहे। वे ताउम्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे। उनके उदार दृष्टिकोण से महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण भी प्रभावित रहे। जीवन भर अविवाहित रहे नाना जी ने रचनात्मक कार्यों में अपने को समर्पित किया था।बचपन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में उनकी भेंट संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार से हुई थी । वह बालक नाना जी के कार्यों से अत्यंत प्रभावित हुए और मैट्रिक की पढ़ाई संपन्न होने के बाद डॉ हेडगेवार ने नाना जी की शिक्षा के लिए पिलानी जाने का मार्ग प्रशस्त किया। शिक्षा के साथ ही साथ उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक के रूप में भी कार्य किया। उन्होंने उत्तर प्रदेश में जनसंघ को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1957 तक जनसंघ ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में अपनी इकाई बना ली । जब वर्ष 1977 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने जनसंघ घटक से उन्हें उद्योग मंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया और फिर 1 वर्ष बाद ही उन्होंने राजनीति से सन्यास लेकर रचनात्मक कार्य मे लगने की घोषणा की। दिल्ली में उन्होंने अपने मित्र दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर एक शोध संस्थान स्थापित किया और चित्रकूट का ग्रामोद्योग विश्वविद्यालय भी गांधी के ग्राम स्वराज्य की कल्पना के आधार पर उनकी देन है। नाना जी ने 27 फरवरी 2010 को अपने कर्म भूमि चित्रकूट में अपना शरीर त्यागा और पूर्व के लिए गए देहदान के अनुसार उनका पार्थिव शरीर आयुर्विज्ञान संस्थान को सौंपा गया।

 देश के 13वें राष्ट्रपति रहे प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से यह सम्मान ग्रहण किया, जबकि दिवंगत संगीतकार भूपेन हजारिका की जगह उनके पुत्र तेज हजारिका ने तथा सामाजिक कार्यकर्ता दिवंगत  नानाजी देशमुख की जगह दीनदयाल अनुसंधान संस्थान के अध्यक्ष वीरेंद्र जीत सिंह ने यह सम्मान ग्रहण किया।

इस समारोह में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह,वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी समेत कई नेता मौजूद रहे।

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Author: Dr. A. K Rai

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